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सुभाषचन्द्र मां भारती के सपूत सुभाष


तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा चलो दिल्ली मैं तुम्हें अंग्रेजों से मुक्त कराउंगा

जन्म से ही थे वे सेनापति
साधना भारत मां की मुक्ति
जन्म जिसका हुआ कटक में
(कटक उड़ीसा याने सेन्य स्थली)
मिटाए थे मां भारती के संकट
दिल में थी मां भारती की शक्ति
पूर्वोत्तर में उखाड़ फेंके , अंग्रेज अधिपति
जय हिंद का नारा था भक्ति थी
जन-जन की अभिव्यक्ति थी
सरहिंद था, शेर ए हिंदुस्तान था शेरे सुभाष था देश की आंखें-जुबान था
थर्राया थाअंग्रेज
भूला अंग्रेजियत था
जीता पूर्वी भारत था
सुभाष ने अपना खून बहाया आज हमने अपनो के खून से नहाया
चोरी डकैती यही
हमारी फितरत
क्या यही थी?
सुभाष की विरासत
क्या यही स्वप्न था?
सुभाष का भारत
पूछता है भारत
आज हम हम
Gen -Z का झंडा उठाए हैं गद्दारों को सर बिठाएं हैं उठो सुभाष का झंडा फहराना है
भारत को स्वर्णिम बनाना है

रचनाकार-
राम वल्लभ गुप्ता इंदौरी

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