
जब उतरे आंगन में धूप,
प्यार से मां मुझे जगाती ।
घुटबन घुटबन मैं चलता था,
काला टीका माथे पे लगाती।
नन्हा बचपन मेरा था।।
गिर जाता तो मुझे उठाती,
उंगली पकड़कर मुझे चलाती।
रोता मैं तो मुंह बिचकाती,
लाड प्यार से फूसलाती।
नन्हा बचपन मेरा था।।
जब जब रुठू मुझे मनाती,
ज़ख्मों पे भी दवा लगाती।
ख़ुद जागकर मुझे सुलाती,
थपकी देकर लोरी सुनाती।
नन्हा बचपन मेरा था।।
जमी से शिखर तक साथ है देती,
मेरी हर खता को हस के भुलाती।
आंखों में छुपी ख्वाहिशों को पहचान लेती,
थाम के उंगली चलना मां सिखलाती।
नन्हा बचपन मेरा था।।
आस न करती कुछ भी मुझसे,
पास रही मां हरदम दिल के।
होते हैं गर जरा उदास,
दोस्त बन के रहती मां साथ।
नन्हा बचपन मेरा था।।
रजनी कुमारी
लखनऊ, उत्तर प्रदेश











