
सुबह की उस चीख़ के बाद मिहार पूरा काँप रहा था।
कुएँ के पास मिला आदमी अभी भी बेहोश था,
लेकिन उसकी पीठ पर कोयले से लिखा “३२”
पूरे गाँव में आग की तरह फैल चुका था।
राजशरण, गंगाराम, सरगम और चंदभान—
सब कुएँ के किनारे खड़े थे।
हवा में एक अजीब-सा दबाव था,
जैसे रात कोई फैसला करके लौटी हो।
1. चंदभान का रहस्य
सरगम ने पहली बार चंदभान के चेहरे पर
इतना डर देखा।
उसने पूछा—
“३२ का मतलब है न, मास्टरजी?
आप जानते हैं…”
चंदभान चुप रहे।
होंठ काँप रहे थे, गला सूख गया था।
राजशरण और गंगाराम उन्हें घूर रहे थे।
अब उनकी चुप्पी किसी गुनाह जैसी लग रही थी।
सरगम ने इस बार कठोर होकर कहा—
“ये संयोग नहीं हो सकता।
चौपाल पर ३२…
इस आदमी की पीठ पर ३२…
और आप चुप हैं?”
चंदभान के कंधे झुक गए।
आख़िरकार उन्होंने कहा—
“क्योंकि ये संख्या
मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती है।”
सन्नाटा छा गया।
2. पुरानी फ़ाइल का खुला सच
पहली बार चंदभान ने वह फ़ाइल खोली
जिसे वे पच्चीस साल से छुपाए हुए थे।
टूटी हुई आवाज़ में बोले—
“जब मिहार का पहला नरसंहार हुआ था,
तब मैंने और कुछ लोगों ने
गुप्त रूप से एक सूची बनाई थी।
उन ३२ लोगों की,
जिन्हें हमने उस घटना का
कारण मान लिया था।”
सरगम चौंक गई—
“कारण?
मतलब आरोप… बिना सबूत?”
चंदभान की आँखें भर आईं।
उन्होंने सिर हिलाया—
“हाँ…
वो जल्दबाज़ी थी, डर था, गुस्सा था।
हमने सच नहीं,
अपनी धारणाएँ लिख दी थीं।”
राजशरण ने धीरे से पूछा—
“तो ये ३२ लोग…
अब कोई उन्हें…?”
चंदभान बोले—
“या तो निशाना बनाया जा रहा है…
या फिर सच उजागर किया जा रहा है।”
उन्हें खुद नहीं पता था
कि यह बदला है
या न्याय की एक विकृत कोशिश।
3. सूची का पहला नाम
गंगाराम ने पूछा—
“उस आदमी का नाम क्या है
जो कुएँ के पास मिला?”
चंदभान हिचकते हुए बोले—
“सुरेश मालाकार।”
सरगम तुरंत बोली—
“वही, जो बीस साल पहले
गाँव छोड़कर शहर चला गया था?”
“हाँ,” चंदभान ने कहा,
“और जिसका नाम
उस सूची में पहले नंबर पर था।”
राजशरण ने सवाल उठाया—
“वो तो गाँव से बाहर था,
फिर उसे यहाँ कौन लाया?”
गंगाराम बुदबुदाया—
“परछाइयाँ…”
फिर रुककर बोला—
“या कोई ऐसा इंसान
जिसे पच्चीस साल पुरानी
सूची का हर नाम याद है।”
4. जुना की मजबूर चुप्पी
उधर, जुना चौपाल से दूर
सूखी नदी के किनारे बैठा था।
मुट्ठियाँ मिट्टी में धँसी थीं,
आँखें लाल थीं।
सरगम उसके पास पहुँची—
“तू कुछ छुपा रहा है, जुना।”
जुना चुप रहा।
सरगम ने कहा—
“कुएँ के पास
तू रात में था।
तूने कुछ देखा है।”
जुना की साँसें भारी हो गईं।
टूटी आवाज़ में बोला—
“वो इंसान था…
पर इंसान जैसा नहीं।
किसी को घसीटते हुए
कुएँ तक लाया था।”
सरगम का दिल धड़क उठा—
“चेहरा देखा?”
जुना ने सिर उठाया।
आँखों में डर तैर रहा था—
“चेहरा नहीं…
पर उसकी परछाईं
मानव जैसी नहीं थी।”
5. सच का पहला झटका
शाम तक सुरेश मालाकार
होश में आ गया।
वह काँप रहा था,
बोल नहीं पा रहा था।
बस एक शब्द निकला—
“सूची…”
उसने हाथ उठाकर
चंदभान की ओर इशारा किया
और बेहोश हो गया।
चंदभान का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
जैसे किसी ने
उनके भीतर छुपी कब्रों पर
पाँव रख दिया हो।
गंगाराम ने पूछा—
“क्या वो तुम्हें पहचानता है, मास्टरजी?”
चंदभान बोले—
“नहीं…
वो मुझे नहीं,
मेरे गुनाह को पहचानता है।”
6. रात का ऐलान
सूरज ढलते ही
उत्तर छोर की पहाड़ी से
वही लंबी, डरावनी आवाज़ उठी—
जो पहली बार साढ़े चार बजे
सुनी गई थी।
इस बार आवाज़
और गहरी… और क़रीब थी।
गंगाराम बोला—
“आज रात दूसरा नाम जागेगा।”
सरगम ने पूछा—
“दूसरा नाम कौन है?”
काँपते हाथों से
चंदभान ने संदूक खोला,
पुरानी फ़ाइल निकाली।
दूसरा पन्ना पलटते ही
उनकी आवाज़ लड़खड़ा गई—
“नंबर दो — जुना यादव।”
तीनों एक साथ
जुना की ओर मुड़े।
जुना पीछे हट रहा था।
वह जानता था—
अब अगली रात
उसे ही पुकारा जाएगा।
आर एस लॉस्टम











