
आज शब्द नहीं बोल रहे,
संस्कृति बोल रही है…
पहचान बोल रही है…
हिंदी बोल रही है।
हिंदी…
वह भाषा है
जिसमें माँ की ममता बहती है,
पिता का अनुशासन झलकता है,
और गुरु का ज्ञान दीप बनकर जलता है।
यह केवल वर्णों की रचना नहीं,
यह भावनाओं की अभिव्यक्ति है।
जिसमें राम की मर्यादा है,
कबीर का सत्य है,
और मीरा की भक्ति है।
आज जब दुनिया आगे बढ़ रही है,
तो हमें भी बढ़ना है…
पर अपनी जड़ों को थामे हुए।
क्योंकि जो अपनी भाषा का सम्मान करता है,
वही अपने अस्तित्व का सम्मान करता है।
हिंदी हमें जोड़ती है—
गाँव से शहर तक,
दिल से दिल तक,
और भारत से विश्व तक।
आइए संकल्प लें—
हिंदी को केवल बोलेंगे नहीं,
जिएँगे।
केवल पढ़ेंगे नहीं,
गर्व से अपनाएँगे।
क्योंकि
” हिंदी है तो संस्कार हैं
हिंदी है तो संस्कृति है
और हिंदी है…
तो हम हैं।”
डॉ आकांक्षा रूपा चचरा
कटक ओड़िशा











