
भारतीय दर्शन में मानव के भीतर सक्रिय सूक्ष्म तंत्र मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को सामूहिक रूप से अंतःकरण चतुष्टय कहा जाता है। इन चारों में “मन” वह क्षेत्र है जहाँ विचार उदित होते हैं, भावनाएँ जन्म लेती हैं, इच्छाएँ रूप ग्रहण करती हैं और निर्णय से पूर्व की आंतरिक हलचल घटित होती है। यही संकल्प–विकल्प की भूमि है, जो प्रत्येक क्षण मनुष्य के भीतर प्रश्न उठाती है कि करूँ या न करूँ, चाहूँ या त्याग दूँ, ठहरूँ या आगे बढ़ जाऊँ। उपनिषदों में कहा गया है कि “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः” अर्थात् मनुष्य के बंधन और मोक्ष, दोनों का मूल कारण मन ही है। जब मन इंद्रिय-विषयों की ओर प्रवृत्त होता है, तब वह आसक्ति और बंधन का निर्माण करता है; किंतु जब वही मन सत्य, साधना और आत्मचिंतन की ओर उन्मुख होता है, तब मुक्ति का द्वार उद्घाटित हो जाता है। मैं इसी गहन आध्यात्मिक सत्य को सरल, प्रतीकात्मक तथा अनुभव-सुलभ रूप में नीचे एक कथा के माध्यम से प्रस्तुत कर, मन के स्वरूप को स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ।
हिमालय की नीरव गोद में, बादलों से संवाद करते ऊँचे शिखरों के मध्य एक प्राचीन आश्रम स्थित था। वहाँ का वातावरण मानो बाहरी संसार से भिन्न किसी सूक्ष्म लय में स्पंदित होता रहता था। प्रातःकाल की वायु में देवदार की सुगंध घुल जाती, दोपहर में झरनों की कलकल ध्वनि जप के समान प्रतीत होती और सायंकाल के समय मंदिर की घंटियों की गूँज पर्वतों से प्रतिध्वनित होकर मानो आकाश को भी ध्यानमग्न कर देती थी। इसी आश्रम में एक वृद्ध गुरु, मानसानंद जी, निवास करते थे। उनके मुखमंडल पर आयु की रेखाएँ स्पष्ट थीं, किंतु उनकी दृष्टि में बालक जैसी निर्मलता झलकती थी। वे अल्पभाषी थे, परंतु उनके प्रत्येक शब्द शिष्यों के अंतर्मन में दीर्घकाल तक प्रतिध्वनित होते रहते। लोग कहा करते थे कि वे उत्तर नहीं देते, पर प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आत्मानुभव का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
इस आश्रम में आरव नाम का एक युवक भी रहता था। वह शिक्षित, तेजस्वी और संवेदनशील था। उसने शास्त्रों का अध्ययन किया था, मंत्रों का शुद्ध उच्चारण जानता था और ध्यान की मुद्राओं का भी अभ्यास करता था। इतना ज्ञान होने के बावजूद उसका मन सदा अशांत रहता था। जैसे ही वह आँखें बंद करता, उसके भीतर विचारों की भीड़ उमड़ पड़ती। उसे कभी बचपन की स्मृतियाँ, कभी भविष्य की कल्पनाएँ, कभी अपमान की टीस, तो कभी सफलता के सपने। इन सबके कारण वह भीतर ही भीतर व्याकुल हो जाता था। वह ध्यान करने बैठता, पर ध्यान में स्थिर नहीं हो पाता था। कई दिनों की असफलता के बाद एक दिन संध्या के समय वह अपने गुरु मानसानंद जी के पास गया। उसने विनम्र और धीमे स्वर में कहा—
“गुरुदेव, मैं ध्यान करने का प्रयास करता हूँ, पर मेरा मन रुकता ही नहीं। अब मैं स्वयं से ही हारने लगा हूँ।”
गुरु मानसानंद जी ने उसे गहन दृष्टि से देखा। वे कुछ क्षण मौन रहे, मानो उसके शब्दों से अधिक उसकी अंतरस्थिति को पढ़ रहे हों। तत्पश्चात उन्होंने शांत स्वर में कहा —
“बेटा, कल प्रातः वन में जाओ। वहाँ जो जीव तुम्हें सबसे अधिक चंचल दिखाई दे, उसे बिना टोके, बिना भगाए, केवल देखना और फिर लौटकर मुझे बताना।”
आरव यह सुनकर चकित रह गया। उसे लगा था कि गुरु उसे कोई मंत्र देंगे या ध्यान की कोई विशेष विधि बताएँगे। किंतु यहाँ तो उसे वन में भेजा जा रहा था। फिर भी वह भलीभाँति जानता था कि गुरु का मार्ग भले ही सीधा न प्रतीत हो, पर वह सदैव सही होता है।
अगली सुबह, जब आकाश हल्की गुलाबी आभा से आलोकित हो रहा था, तब आरव वन की ओर चल पड़ा। ओस से भीगी घास उसके चरणों को शीतल कर रही थी। पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण में जीवन का संचार कर रहा था, किंतु उसके भीतर अब भी विचारों की वही हलचल बनी हुई थी। तभी उसकी दृष्टि एक ऊँचे वृक्ष पर पड़ी। वहाँ एक बंदर था। वह एक डाल से दूसरी डाल पर निरंतर उछल-कूद कर रहा था। कभी कोई कच्चा फल तोड़ता, उसे चखकर तुरंत नीचे फेंक देता। फिर किसी पत्ते को नोचता, नीचे झाँकता और अचानक किसी आहट से चौंककर ऊपर की ओर भाग जाता। उसकी आँखों में बेचैनी, शरीर में अस्थिरता और उसके व्यवहार में निरर्थक चंचलता स्पष्ट झलक रही थी।
आरव पास ही एक पत्थर पर बैठ गया और वह बंदर को ध्यानपूर्वक देखने लगा। प्रारम्भ में यह दृश्य उसे मनोरंजक लगा, पर थोड़ी ही देर में उसे अनुभव हुआ कि वह बंदर उसके अपने मन के समान है। बंदर फल तोड़ता और तुरंत फेंक दे रहा था। अब उसे लगा कि, ऐसे ही उसका मन भी अनेक इच्छाएँ करता है, पर शीघ्र ही उनसे ऊब जाता है। फिर उसने देखा कि बंदर अचानक चौंककर डर जाता है; तब उसे स्मरण हुआ कि उसका मन भी कई बार बिना कारण भय और चिंता से परेशान हो जाता है। बंदर ऊँचाई पर चढ़कर नीचे झाँकता तो उसे प्रतीत हुआ कि उसका मन भी कभी अहंकारवश ऊपर उठता है और कभी असुरक्षा के कारण नीचे गिर जाता है। अब उसे स्पष्ट समझ आने लगा था कि वह बाहर किसी साधारण बंदर को नहीं, बल्कि अपने ही चंचल मन रूपी बंदर के स्वरूप को देख रहा है।
अब काफी समय बीत चुका था, किंतु बंदर की चंचलता में तनिक भी कमी नहीं आई। आरव थकने लगा, पर वह बंदर मानो थकना जानता ही न हो। तभी उसके भीतर एक विचार उठा कि “यह जीव क्यों नहीं थकता?” अचानक उसी क्षण उसे दूसरा विचार आया कि “मेरा मन भी तो ठीक ऐसा ही है।”
अब उसे भगवद्गीता का एक श्लोक याद आया —
“चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥”
(भगवद्गीता 6.34)
अर्थ: हे कृष्ण! मन अत्यंत चंचल, उद्वेग उत्पन्न करने वाला, बलवान और हठी है। उसे वश में करना वायु को रोकने के समान अत्यंत कठिन प्रतीत होता है।
इस श्लोक के याद आते ही आरव को अनुभव हुआ कि अर्जुन की यह व्यथा उसकी अपनी ही स्थिति का सटीक चित्रण है।
अब आरव आश्रम की ओर लौट चला। जब वह आश्रम पहुँचा, तो उसके गुरु मानसानंद जी ने आरव से स्नेहपूर्वक पूछा, “बेटा, क्या देखा?”
आरव ने विनम्रता से उत्तर दिया, “गुरुदेव, मैंने एक पेड़ पर एक बंदर देखा जो एक पल भी स्थिर नहीं था। बिना कारण कूदता, बिना भूख लगे भी खाता रहता और बिना किसी वास्तविक खतरे के भी डर जाता था। उसे देखकर मुझे ऐसा लगा, मानो मैं अपने ही मन को देख रहा हूँ।”
गुरु जी की आँखों में संतोष नजर आया। वे बोले, “आरव, आज तुमने अपने मन को पहली बार अपने से अलग होकर देखा है।”
गुरु मानसानंद जी ने समझाते हुए कहा —
बेटा, मन इंद्रियों और बुद्धि के बीच का सेतु है। आँखें दृश्य देखती हैं, पर उनका अर्थ मन बनाता है। कान ध्वनि सुनते हैं, पर प्रतिक्रिया मन करता है। मन ही संकल्प–विकल्प का क्षेत्र है। मन ही कहता है कि ‘यह अच्छा है’, ‘यह बुरा है’, ‘यह चाहिए’, ‘यह नहीं चाहिए।’
बंदर की भाँति मन हर अनुभव को पकड़ लेना चाहता है। यही पकड़ आगे चलकर आसक्ति बन जाती है और जिसे पकड़ लिया उसे खो देने का भय ही चिंता का मूल कारण बनता है।
फिर गुरु मानसानंद जी ने कठोपनिषद का एक प्रसिद्ध दृष्टांत सुनाते हुए कहा —
“आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि, मनः प्रग्रहमेव च॥”
अर्थ: आत्मा रथ का स्वामी है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है और मन उस रथ की लगाम है।
गुरु जी ने आगे समझाते हुए कहा — “यदि मन की लगाम ढीली पड़ जाए, तो इंद्रियाँ उन्मुक्त घोड़ों की भाँति इधर-उधर दौड़ने लगती हैं। किंतु यदि मन संयमित और नियंत्रित हो, तो बुद्धि उस रथ को सही मार्ग पर आगे बढ़ाती है।”
आरव ने विनम्रता से पूछा, “गुरुदेव, क्या मन सदा ऐसा ही चंचल रहेगा?”
गुरु मानसानंद जी मुस्कुराए और बोले, “मन का स्वभाव गति है। उसे बलपूर्वक रोकना नहीं, उचित दिशा देना सीखो। नदी को पूरी तरह बाँध दोगे तो बाढ़ आ जाएगी; पर यदि उसके प्रवाह को नहरों के माध्यम से मार्ग दोगे, तो वही जल खेतों को सींचकर जीवनदायी बन जाता है।”
उस दिन से आरव ने नियमित साधना आरंभ कर दी। वह प्राणायाम के माध्यम से अपनी श्वास को संतुलित करने लगा, जप के द्वारा मन को एक लय में बाँधने लगा और ध्यान में बार-बार उसे एक ही बिंदु पर स्थिर करने का अभ्यास करने लगा। धीरे-धीरे यह उसकी दैनिक दिनचर्या का अंग बन गया। मन भागता, तो वह उसे सजग होकर देखता; मन भटकता, तो वह उसे स्नेहपूर्वक पुनः लौटा लाता। उसे गीता का यह वचन सदैव स्मरण रहता—
“अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।”
(भगवद्गीता 6.35)
अर्थ: हे कौन्तेय (अर्जुन)! अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को वश में किया जा सकता है।
अब आरव ने अपने अभ्यास के प्रथम दिन का अनुभव गुरु जी को सुनाते हुए कहा, “गुरुदेव, आज मेरा मन बहुत अधिक भटका। आपकी आज्ञा के अनुसार मैं ध्यान में बैठा रहा, पर मन को बार-बार भागते देखकर मैं निराश हो गया हूँ।”
गुरु मानसानंद जी मुस्कुराए और बोले, “तुम्हें यह ज्ञात हो गया कि मन भटक रहा है, यही जागरण की शुरुआत है।”
धीरे-धीरे आरव के विचारों के बीच छोटे-छोटे विराम दिखने लगे, मानो बादलों के बीच से नीला आकाश झलक रहा हो।
कई महीनों के नियमित अभ्यास के बाद एक दिन ध्यान के दौरान आरव ने अपने भीतर गहरी शांति का अनुभव किया। विचार उपस्थित थे, किंतु वे दूर प्रतीत हो रहे थे। भावनाएँ उठती थीं, पर वे उसे बाँध नहीं पा रही थीं। उसके अंतर्मन में एक मधुर उजास फैल रहा था, मानो बादलों के पीछे से सूर्य शांत मुस्कान बिखेर रहा हो।
उस अनुभव से आनंदित होकर वह पुनः गुरु मानसानंद जी के पास पहुँचा और बोला, “गुरुदेव, अब मेरा ध्यान स्थिर होने लगा है।”
गुरु जी ने स्नेहपूर्वक कहा, “जब मन रूपी बंदर मित्र बन जाता है, तब वह उछल-कूद छोड़ देता है। मन के शांत होते ही आत्मा का प्रकाश झलकने लगता है।”
अब आरव भली-भाँति समझ चुका था कि मन शत्रु नहीं, बल्कि एक अनियंत्रित शक्ति है। असंयमित मन संसार के बंधनों को जन्म देता है, संयमित मन साधना का साधन बन जाता है और शांत मन आत्मदर्शन का निर्मल दर्पण बन जाता है।
समय बीतता गया। अब भी उसके भीतर विचार उठते थे, किंतु वे उसे बहाकर नहीं ले जाते थे। इच्छाएँ आतीं, पर वह उन्हें साक्षी भाव से आते-जाते देख पाता था। भय भी कभी-कभी उदित होता, पर टिक नहीं पाता था। उसे अनुभव होने लगा कि मन का उद्देश्य निरर्थक शोर करना नहीं, बल्कि चेतना को अनुभवों से परिचित कराना है।
एक दिन उसने गुरु मानसानंद जी से मुस्कुराकर कहा, “गुरुदेव, अब मुझे उस बंदर से डर नहीं लगता।”
गुरु जी हँस पड़े और बोले, “क्योंकि अब तुम उसे पहचानने लगे हो।”
उसी क्षण आरव के भीतर एक गहरी अनुभूति जागी—मुक्ति कहीं दूर नहीं, मन की दिशा में ही छिपी है। जब मन विषयों का बंदर बना रहता है, तब जीवन एक उलझा हुआ जंगल प्रतीत होता है; पर जब वही मन साधना का साथी बन जाता है, तब यही जीवन आश्रम के समान पवित्र और शांत हो उठता है। यही अंतःकरण चतुष्टय के प्रथम आयाम मन का गहन रहस्य है।
अंतःकरण चतुष्टय के अन्य तीन आयामों के साथ भी मन का गहरा और अभिन्न संबंध है। “मन” संकल्प–विकल्प करता है और अनुभवों को ग्रहण करता है, पर उन अनुभवों का निर्णय “बुद्धि” करती है — क्या उचित है और क्या अनुचित है। जो अनुभव बार-बार मन में उठते हैं और प्रभाव छोड़ते हैं, वे “चित्त” में संस्कार और स्मृतियों के रूप में संचित हो जाते हैं; यही संस्कार आगे चलकर मन की प्रवृत्तियों को दिशा देते हैं। इन सब पर “मैं” की भावना का आवरण “अहंकार” डालता है, जो अनुभवों को स्वयं से जोड़कर कहता है कि “मैं सोच रहा हूँ”, “मैं दुखी हूँ”, “मैं सफल हूँ।” इस प्रकार मन अनुभवों को लाता है, बुद्धि उनका विवेक करती है, चित्त उन्हें संचित रखता है और अहंकार उन्हें ‘मैं’ से जोड़ देता है। जब मन संयमित होता है, तो बुद्धि निर्मल निर्णय करती है, चित्त शुद्ध होता है और अहंकार क्षीण होने लगता है, यही अंतःकरण की सामंजस्यपूर्ण अवस्था आध्यात्मिक उन्नति का आधार बनती है।
अत: इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मन को दबाने से नहीं, समझने और साधने से शांति मिलती है।
जब मन हमारा स्वामी न रहकर हमारा साधन बन जाता है, तभी जीवन में संतुलन, स्पष्टता और आत्मिक प्रकाश का अनुभव होता है।
योगेश गहतोड़ी “यश”
नई दिल्ली – 110059











