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रात का दूसरा नाम


गाँव की साँझ धीरे-धीरे मिहार पर काले धुएँ की तरह उतर रही थी।
हर घर के दरवाज़े पर एक अनजाना डर टँगा हुआ था—
जैसे कोई अदृश्य हाथ हर आँगन में चेतावनी लिख गया हो।
जुना पूरे दिन चुप रहा,
पर उसकी आँखों में जो तूफ़ान था—
वह अब रोके जाने वाला नहीं था।
1. दूसरा नाम जागता है
अँधेरा जब पूरी तरह फैल गया,
दूर पहाड़ी से फिर वही लंबी, गहरी आवाज़ उठी—
जैसे ज़मीन के नीचे दबी कोई चीज़
पहली बार साँस ले रही हो।
गंगाराम ने धीमे स्वर में कहा—
“दूसरा नाम जाग गया है आज रात…
जुना को पुकारेगा।”
जुना के क़दम डगमगा गए।
उसने ख़ुद को सँभाला,
पर भीतर का डर उसके चेहरे पर
खुली किताब की तरह था।
चंदभान काँपते हुए बोला—
“अगर मैंने उस समय बिना सोचे
तुम्हारा नाम सूची में नहीं लिखा होता…
तो आज—”
जुना ने उसे बीच में रोक दिया—
“अब माफ़ी का कोई मतलब नहीं, मास्टरजी।
जो लिखा गया था,
वो अब मिटाया नहीं जा सकता।”
उसके स्वर में रोष नहीं था—
सिर्फ़ थका हुआ सच था।
2. जुना की कहानी
सरगम उसके सामने बैठी।
“तुमने किया क्या था,
पच्चीस साल पहले?”
जुना ने गहरी साँस ली।
“कुछ नहीं।”
लंबी चुप्पी छा गई।
फिर वह बोला—
“मेरी गलती बस इतनी थी
कि मैं गलत जगह,
गलत समय पर था।
उस दिन खेतों से जंगल के गुंडे आए थे।
वे किसी और को ढूँढ रहे थे।
मैं भागा नहीं—
क्योंकि मुझे लगा मैं निर्दोष हूँ।
लेकिन चंदभान और गाँव के कुछ लोगों ने
मेरे न भागने को
‘साथ देना’ समझ लिया।
उसी गलतफहमी ने
मुझे इस सूची में डाल दिया।”
जुना की आँखें भर आईं—
“और मैं पच्चीस साल से
उस एक गलती की सज़ा काट रहा हूँ।”
रामशरण ने पगड़ी खींच ली—
“ये सूची…
इस गाँव को तबाह कर देगी।”
गंगाराम ने बस इतना कहा—
“सूचियाँ नहीं,
गलत निर्णय तबाही लाते हैं।”
3. दूसरी पुकार
रात गहरी हो चुकी थी।
गाँव के कुत्ते एक साथ
दक्षिण दिशा में भौंकने लगे।
जुना उठ खड़ा हुआ।
चेहरे पर अजीब-सी ठंडक उतर आई।
“वो आ गया…”
उसने फुसफुसाया।
सरगम ने उसका हाथ पकड़ा—
“तुम अकेले नहीं जाओगे।”
लेकिन जुना ने हाथ छुड़ा लिया—
“यह रास्ता अब
मेरा ही है।”
वह लालटेन लेकर
धीरे-धीरे सूखी नदी की ओर बढ़ा,
जहाँ रात
और गहरे रंगों में बदल रही थी।
4. सूखी नदी का सच
नदी के किनारे खड़ा जुना
हवा में मिट्टी नहीं,
राख की गंध महसूस कर रहा था।
अचानक उसके सामने
एक परछाईं उभरी—
लंबी, विकृत,
आदमी जैसी पर मानव नहीं।
जुना की साँस रुक गई।
परछाईं उसके चारों ओर
धीरे-धीरे घूमने लगी।
ज़मीन पर उसकी छाया
एक गोल घेरे में
जुना को बंद कर रही थी।
जुना बोला—
“अगर तू मुझसे मेरा सच पूछने आया है,
तो सुन—
मैंने किसी की हत्या नहीं की।
किसी दंगे में नहीं था।
किसी का साथ नहीं दिया।
मैं बस…
उस दिन ज़िंदा बच गया था।”
परछाईं काँपी—
जैसे सुन रही हो।
5. दूसरी परछाईं का टूटना
अचानक गंगाराम की आवाज़ गूँजी—
“बस!”
वह तेज़ क़दमों से आया
और जुना के सामने खड़ा हो गया।
“यह परछाईं किसी आत्मा की नहीं,”
गंगाराम बोला,
“यह तेरे वर्षों का डर है, जुना।
और डर तब तक मारता है
जब तक उसे स्वीकार न कर लिया जाए।”
परछाईं काँपने लगी—
जैसे कोई छवि टूट रही हो।
जुना ने आँखें बंद कीं।
पहली बार भीतर का बोझ शब्दों में ढाला—
“हाँ, मैं डरता था।
क्योंकि मैंने कुछ नहीं किया,
फिर भी दोषी ठहराया गया।
वहीं से मैं टूट गया था।”
स्वीकार होते ही
परछाईं बिखर गई—
हवा में धुएँ की तरह।
गंगाराम मुस्कुराया—
“दूसरा नाम मुक्त हुआ।”
रामशरण और सरगम भी वहाँ पहुँच गए।
सरगम बोली—
“तुम बचे, जुना।
अब सच आगे बढ़ाने की बारी है।”
6. लेकिन अँधेरा यहीं नहीं रुकता
अचानक सरगम के पैरों के पास
एक काला काग़ज़ उड़कर गिरा—
जैसे किसी ने हवा को चीरकर फेंका हो।
उस पर लिखा था—
“अब तीसरा नाम जागेगा।
और इस बार
परछाईं अकेली नहीं आएगी।”
गंगाराम ने काग़ज़ मोड़ा और कहा—
“तीसरा नाम
इस कहानी की दिशा बदल देगा।”
रात के ऊपर कहीं,
कोई नई परछाईं
पहले से ज़्यादा भारी,
पहले से ज़्यादा क्रूर
साँस ले रही थी।
आर एस लॉस्टम

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