
ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण किया और उसे स्वतंत्र छोड़ दिया। संपूर्ण सृष्टि पर ईश्वरीय तीन नियम परिवर्तन, संतुलन और उदर पालन बिना भेद भाव के पूर्णतः लागू होते हैं ।।
मनुष्य को छोड़कर बाकी प्राणी जगत इसी नियम पर चलता है, क्योंकि मनुष्य के पास बुद्धि और विवेक है तो वह कुछ शोध करता रहता है ।।
मनुष्य बुद्धि की विडंबना यह है कि वह नकारात्मक अधिक देखती है । मनुष्य बुद्धि अवगुण देखने में अधिक रुचि रखती है । जैसे किसी विद्वान ने कहा कि क्या हुआ कि तुम सागर हो तो किसी की प्यास तो तुम बुझा नहीं सकते ?? उस विद्वान ने समुद्र के खारेपन को उसके अवगुण के रूप में विख्यात कर दिया और वह विद्वान यह भूल गया कि यह खारापन उसका सबसे बड़ा गुण है जो उसे ईश्वर ने दिया है और इसी खारेपन में सृष्टि की 84 लाख योनियों की आधी अर्थात 42 लाख योनियां रहती हैं । समुद्र के अंदर पूरी एक सृष्टि है । जो हमारे सामने होते हुए भी अदृश्य है ।।
ईश्वर ने सौ गुणों के साथ एक अवगुण और सौ अवगुणों के साथ एक गुण हर किसी को दिया है। सृष्टि में पूर्ण रूपेण ना तो कोई गुणी है और ना ही कोई अवगुणी है ।।
विद्वान जन शास्त्र की बात करते हैं लेकिन शास्त्र के एक कथन को सिरे से नकार देते हैं कि, समयानुसार शोध और संशोधन होते रहना चाहिए क्योंकि सृष्टि परिवर्तनशील है और जो बदलता नहीं है वह निष्क्रिय हो जाता जाता है ।।
स्वयं ईश्वर ने अवतार भी देश, काल और परिस्थिति के अनुसार धारण किए हैं और यह तो बताने कि आवश्यकता नहीं है कि उन अवतारों में एक अवतार वाराह भी है ।।
जब त्रेता के राम का द्वापर में अपने स्वभाव के ठीक विपरीत रूप धारण करना भी इसी परिवर्तन का हिस्सा है । हां परिवर्तन के साथ मूल उद्देश्य को ना भूलना भी सृष्टिकर्ता ही सिखाता है ।।
लेख– कृष्णगामी गीता नाथ ।।
हरिकृपा ।।
मंगल कामना ।।











