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ये सफ़र

है ये जिंदगी— ‘खुद के साथ खुद का एक अज्ञात सफ़र।’

है फलसफा– सफ़र आसां होगा नहीं मन में स्वार्थ अगर।

हे स्वार्थ ! तेरा शुक्रिया जो बांध के रखा हर इंसा इस सफ़र।

मुश्किल है लांघ जानी जिंदगी की अज्ञात रपटीली ये डगर।

स्वार्थवश जो हाथ थामा, मिल गया था हमनशीं हमसफ़र।

स्वार्थ को क्या कोसना, स्वार्थमय हर जीव मिला इस डगर।

स्वार्थ के आकर्षण बंधा मृत्युलोक ,इंसा नहीं तो दर-बदर।

सभी जी रहे— ‘खुद के साथ खुद का एक अज्ञात सफ़र।’

स्वार्थ-मुक्त जो आत्मा, जग नतमस्तक हो कहे–महात्मा।

परोपकार की चाह मे कहीं नहीं स्वार्थ, कहलाए सदात्मा।

ऐसी सदात्माएं ही छोड़ जाती हैं अपने कदमों के निशां।

सदात्मा जन्में जग,बन उजाले की किरण जब रात अमा।

                                  महेश शर्मा, करनाल

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