
दुनिया लगती एक मेला है
अपनों की भीड़ में धकेला है
खालीपन दिल के किसी कोने में
कभी कभी तन्हा रातों में अकेले में
कोई नहीं जो सुने मेरे मन की
किस से कहूं अपने मन तन की
हर रिश्ता है जिंदगी में फिर भी
क्यों कमी खलती है किसी अपने की
सबके होते हुए भी अकेलापन है
ना कोई साथी ना सकेलापन है
बे पेंदी सा लुढका जाता है जिधर चाहे
ना कोई पूछे कि तू किधर जाये
मन का खालीपन कभी भरता नहीं
कोई अपना मुझ पर मरता नहीं
आंखों से आसूं भी अब निकलते नहीं
कुछ ज़ख्म ऐसे जो भरते नहीं
बिन धागे कटी पतंग सा हो गया
ये जीवन किसी अपने को रो गया
कहते हैं जीवन सब मोह माया है
फिर क्यों यहां सबने दिल दुखाया है
प्रिया काम्बोज प्रिया सहारनपुर उत्तर प्रदेश











