
आत्मा अंततः कर्म भोग
कर्मरत मृत्यु लोक
सत्य कर्म
सुस्पष्ट करें…. जावे जीव परलोक।
सत्य ज्ञान बल
आत्मा इच्छा रहित हो…. त्यागे इहलोक।
परमसत्ता में विलीन हो
तब मार्ग से हटें सब रोक।
‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ ये ही परम सत्य
इच्छाओं में क्षण-क्षण लिप्त
कैसे आत्मा हो निर्लिप्त अशोक
इच्छा रहित हो जीव—अति कठिन
पुनः पुनः आवे मृत्युलोक।
बढ़ती नित्य कामना
यमराज खड़ा सिरहाने
फिर भी पड़ा रहे मोह-माया
कैसे जाए… ब्रह्मलोक।
महेश शर्मा, करनाल











