
जगत् सुधार से पहले, मन आंगन बुहार।
अपने अंतर्मन में हर पल लगाया कर गुहार।।
अन्य को सुधारने से पहले खुद में सुधार कीजिए।
अपने कुविचारों को भगाकर सुविचार शीघ्र कीजिए।।
अपने संग सामाजिक कल्याण करते हुए उद्धार कीजिए।
सहयोगी बनते हुए परोपकारी भावनाओं के प्रचार कीजिए।।
दूसरों की भूल को हम भुला नहीं पाते।
अपनी गलतियों पर खूब इतराते।।
अन्य का बेवजह में ही मज़ाक उड़ाते।
ऐसा अनदेखा करके फिर बहुत मुसकुराते।।
खुद को हर बार बेकसूर मानकर दूसरों को सताते।
व्यर्थ में बोलकर अपनी सकारात्मक ऊर्जा भी गँवाते।।
कभी कीर्तन-भजन आदि के कार्यक्रम में भी नहीं जाते।
आस्तिक कहूँ या उन्हें नास्तिक मेरे शब्द समझ न पाते।।
मन-मंदिर में केवल स्नेह के दीपक जलने चाहिए।
हृदय में बुरे विचार बिलकुल नहीं पलने चाहिए।।
सहयोगी किसी भी रोग आदि से नहीं गलने चाहिए।
प्रत्येक पल हमारे भीतर राम-जाप ही चलने चाहिए।।
अंत में जगत् सुधार से पहले, मन आंगन अवश्य बुहार।
हे मानव! इस नश्वर जगत् में रहकर तभी होगा बेड़ा पार।।
प्रत्येक क्षण स्वयं में सुधार करने वाली-कवयित्री
डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)











