
रहम दिल रैदास नहीं होते थे कभी उदास।
रब्ब या खुदा के बनकर रहते थे सदा दास।।
सहज साधना के मार्ग अपनाने वाले बड़े सीधे होते हैं।
दया दृष्टि रखने वाले रविदास जैसे ही महान् संत होते हैं।।
ईमानदारी से कार्य में लीन रहने वाले स्वयं उदाहरण बनते हैं।
परोपकारी भावनाओं संग सुकर्म करने वाले कल्याण करते हैं।।
“मन चंगा तो कठौती में गंगा” की सीख रैदास देते थे।
समझदार समझ गए पर नासमझ बस उदास होते थे।।
भजनों की भक्ति दिन-रात हँसते हुए किया करते थे।
प्रभु प्राप्ति हेतु कठिन तपस्या नहीं सरल साधना करते थे।।
मन पवित्र है तो हर जगह ईश्वर विद्यमान मिलेंगे।
नादान अभी हो सावधान नहीं तो व्यवधान मिलेंगे।।
खूबसूरत संसार में खामोशी से सत्कर्म ही खिलेंगे।
वरना जलने वाले तुझे अपने आसपास ही मिलेंगे।।
कठिन परिश्रम की परिस्थितियों में मन लगाते थे।
चर्मकार होकर भी रैदास अत्यधिक मुसकुराते थे।।
कर्मों की कलाकारी से कोशिशें बेशुमार करते थे।
परोपकारी भावनाओं वाले रविदास उपकार करते थे।।
अंत में रहम दिल रैदास आपकी अनुयायी ऋचा को है अटूट विश्वास।
भारतीय संस्कारी जन में कायम रहेगी जीते जी आप जैसी आस।।
सदा गुरबाणी धारण करते हुए निरंतर अग्रसर-शिक्षिका, कवयित्री, लेखिका, समाजसेविका-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)











