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नौ महीने का सफ़र – माता-पिता दोनों के लिए

पहला महीना – पहली खुशी
जब तुमने पहली बार कहा, कोई आने वाला है,
मैंने हँसकर तुमसे कहा, घर खुशियों से भरने वाला है।
तुमने मेरी ओर देखा, तो मैंने हाथ तुम्हारा थाम लिया,
उस पल जीवन ने हम दोनों को “माँ-पापा” नाम दिया।

दूसरा महीना – बदलाव
तुम हर दिन बदल रही थीं, मैं चुप साथ खड़ा रहा था,
तुम्हारी हर थकान में, मुझे साहस बड़ा दिख रहा था।
कभी तुम हँस देती थीं, पर कभी चुपचाप हो जाती थी,
तब मैं शांत बैठ जाता जब और तुम मुझे हिम्मत देते थी।

तीसरा महीना – जुड़ाव
रातों में तुम उससे जब धीरे-धीरे बातें करती थीं,
मैं कान लगाकर जैसे उसकी धड़कन सुनता था।
देखा नहीं था उसको, फिर भी वो अपना लगता था,
आने से पहले ही वो दिल में गहराई से बसता था।

चौथा महीना – पहली आहट
पहली हलचल पर तुम हँसकर मुझे बुलाती थी,
मैं भी खुश होकर उस मीठे पल में खो जाता था।
उस दिन सच में सपना जब आकार लेने लगा था,
हम दो से तीन होने का एहसास जगने लगा था।

पाँचवाँ महीना – डर और भरोसा
कभी तुम्हें डर लगता था — क्या मैं सब कर पाऊँगी,
मैं सोचता था — क्या मैं तुम दोनों की रक्षा कर पाऊँगा।
पर हर चिंता में तब हम एक-दूजे को देखते रहते थे,
बिन बोले ही हिम्मत के हम दीप दिलों में जला लेते थे।

छठा महीना – जिम्मेदारी
तुमने अपनी नींद और आराम धीरे-धीरे छोड़ दिए,
मैंने भी अपने कई छोटे सपनों के रास्ते मोड़ दिए।
अब हर योजना में बस एक नन्हा चेहरा रहता था,
हमारा आने वाला कल हर धड़कन में बसता था।

सातवाँ महीना – तैयारी
छोटे कपड़े जब घर में पहली बार सजाए गए,
तुम मुस्काईं चुपके से, मेरे भी आँसू भर आए।
हम नामों की सूची बनाते, फिर हँसकर मिटाते थे,
तुम हर नाम में उसका ही चेहरा ढूँढते जाते थे।

आठवाँ महीना – इंतज़ार
दिन जैसे-जैसे पास आए, धड़कन तेज होने लगी,
तुम्हारी पीड़ा बढ़ती गई, पर आँखों में रोशनी जगी।
मैं बाहर से मजबूत रहा, पर भीतर दुआ में था,
बस तुम्हारा हाथ थामे हर पल तुम्हारे साथ खड़ा था।

नौवाँ महीना – मिलन
फिर वो पल आया, पहली रोने की मीठी धुन बजी,
जैसे थम गया हो समय, साँस भी एक पल को रुकी।
तुमने उसे सीने से लगाया, आँखों में भरा अपनापन,
मैं देखता रह गया — हमारे बीच आ गया एक जीवन।

उस दिन सिर्फ बच्चा ही नहीं जन्मा था हमारे यहाँ,
हम भी नए रूप में जन्मे थे उसी पावन क्षण वहाँ।
तुम माँ बनीं, मैं पिता बना उस पल पहली बार,
प्रेम ने जीवन का सच्चा अर्थ, दिया हमें उपहार।

जन्म के बाद की पहली खुशी
नन्हे हाथों ने उँगली थामी, दिल हौले से पिघल गया,
उसकी छोटी सी मुस्कान में हर दुख जैसे घुल गया।
घर की दीवारों पर, अब हँसी गूँजने लगी हर दिन,
उसकी मीठी सी आवाज़ से रोशन होने लगा हर क्षण।

उसकी आँखों में झिलमिल करते सपनों का प्यारा संसार,
उसकी हर अदा पर दिल हो जाता था बार-बार निस्सार।
हम थकते भी, रुकते भी, पर मुस्कान कभी न जाती,
उसके संग हर छोटी घड़ी भी, खुशियों से भर जाती।

योगेश गहतोड़ी “यश”
नई दिल्ली – 110059

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