Uncategorized
Trending

तीसरा नाम और मिहार की पहली चीख


काले काग़ज़ ने मिहार की हवा और भारी कर दी थी।
जुना की परछाईं टूट चुकी थी,
लेकिन उसकी गूँज अब भी गाँव के हर कोने में महसूस की जा रही थी।
अब सब जानते थे—
तीसरा नाम किसी भी क्षण जाग सकता है।
कोई नहीं जानता था कि वह कौन है,
और सच कहें—कोई जानना भी नहीं चाहता था।
1. तीसरा नाम कौन?
चंदभान फ़ाइल उठा लाया।
इस बार उसके हाथ काँप नहीं रहे थे—
वह डर से सुन हो चुका था।
पन्ना पलटते ही उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
सरगम ने फुसफुसाकर पूछा—
“कौन है… तीसरा?”
चंदभान की आवाज़ मानो किसी सूखे कुएँ की तली से उठी—
“तीसरा नाम… रूणी देवी हैं।”
सन्नाटा चीर देने वाला था।
बूढ़ी रूणी—
जिसके दरवाज़े पर काली मिट्टी का ढेला मिला था,
जिसने रात के काग़ज़ में पहला संदेश पढ़ा था,
और जो पहले ही कह चुकी थी—
“क्या मेरे पाप की आहट मुझे ढूँढ रही है?”
अब वही सूची का तीसरा नाम थी।
2. रूणी का अतीत
रूणी को बुलाया गया।
वह धीरे-धीरे आई—
चेहरे पर सन्नाटा, साँसों में ठंडक।
राशिराम ने पूछा—
“दाई… क्या यह सच है?
क्या तुम उस घटना में शामिल थीं?”
रूणी ने बिना हिले कहा—
“मैं किसी हत्या में शामिल नहीं थी।
लेकिन हाँ… मैंने एक गुनाह किया था।”
सबकी निगाहें उस पर टिक गईं।
वह बोली—
“उस रात…
जब पहली चीख गाँव से उठी,
मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया था।
एक बच्चा बाहर रो रहा था… भाग रहा था।
उसने मेरे दरवाज़े पर सिर पटका—
‘दाई… बचा लो।’
मैंने… दरवाज़ा नहीं खोला।”
उसकी आवाज़ टूट गई।
“वह बच्चा उसी रात मारा गया।
और मैं… उसे बचा सकती थी।”
3. तीसरी पुकार
गंगाराम ने सबकी ओर देखा—
“कभी-कभी पाप किया नहीं जाता…
छोड़ा जाता है।”
रूणी की आँखें झुक गईं।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं—
जैसे वह उन दरवाज़ों को याद कर रही हो
जो उसने बंद छोड़ दिए थे।
तभी दूर पहाड़ी से तीसरी पुकार उठी।
पहली दो पुकारों से अलग—
यह दर्द से बनी थी,
एक टूटी हुई लय,
एक ऐसी चीख
जो यादों से जन्मी थी।
सरगम समझ गई—
यह किसी आत्मा की पुकार नहीं थी।
यह रूणी के अतीत के बच्चे की आवाज़ थी।
“वह आ रहा है,” गंगाराम ने कहा,
“और इस बार परछाईं नहीं—
एक सवाल सामने आएगा।”
4. रात का सबसे अँधेरा मोड़
लोगों ने रूणी को घेर लिया,
पर वह धीरे-धीरे अपनी झोपड़ी की ओर बढ़ी—
मानो जानती हो
कि अब किसका सामना करना है।
राशिराम बोला—
“दाई, मत जाओ! यह सुरक्षित नहीं है।”
रूणी रुकी और बोली—
“पच्चीस साल से
अपने ही दरवाज़े पर टकराती चीख सुन रही हूँ।
अब डरकर नहीं भागूँगी।”
वह झोपड़ी में गई,
लालटेन जलाई
और दरवाज़ा खोल दिया।
अँधेरे से एक छोटी-सी छाया उभरी—
बच्चे की छाया।
धीमी, काँपती,
जैसे कोई पुरानी याद
आकार लेकर लौट आई हो।
रूणी आगे बढ़ी और कहा—
“मैंने दरवाज़ा बंद रखकर गुनाह किया था।
आज… मैंने दरवाज़ा खोल दिया है।”
छाया ठहर गई।
हवा अचानक भारी हो गई—
जैसे साँसें भी सोच-समझकर चल रही हों।
उसी क्षण,
लालटेन की लौ
बिना किसी हवा के
अपने आप बुझ गई।
पूरा गाँव एक साथ यह महसूस कर रहा था—
तीसरा नाम मिटा नहीं है,
वह जाग गया है।
5. मिहार की पहली चीख
अचानक चौपाल से
एक तेज़ चीख उठी।
पूरे गाँव में जैसे बिजली दौड़ गई।
ज़मीन काँप उठी।
सरगम दौड़ी,
राशिराम उसके पीछे,
गंगाराम ने लालटेन उठाई
और तीनों चौपाल की ओर भागे।
वहाँ पहुँचते ही
जो दिखा—
वह किसी को साँस लेने नहीं दे रहा था।
चौपाल के बीच
मिट्टी पर लिखा था—
“अभी तीन ही हुए हैं।
बाक़ी उनतीस
जागने को बेचैन हैं।”
मिट्टी पर
खून की एक बूँद टपकी हुई थी—
ताज़ा।
सरगम काँप गई—
“ये… ये तो किसी ज़िंदा इंसान ने लिखा है।”
गंगाराम की आवाज़
पहली बार भारी नहीं,
ख़तरनाक थी—
“अब खेल बदल गया है।
अब सिर्फ़ परछाइयाँ नहीं,
कोई इंसान भी
इस अँधेरे को दिशा दे रहा है।”
फ़ाइल की तीसरी पंक्ति—
जो पहले भी डर पैदा कर चुकी थी—
आज तीसरी बार
गाँव की रगों में
ज़हर की तरह उतर रही थी।
और मिहार समझ चुका था—
पहली चीख़
आख़िरी चेतावनी नहीं थी।

आर एस लॉस्टम

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *