
कलयुग है दिमागवालों की दूनियाँ है
जिसने चला लिया बस उसके ही आगे पीछे दूनियाँ है
राजयोग काबिलियत पर अब गये जमाने की बात हो गयी
धूर्तता और चतुराई ही बे-मशक्कत राजयोग की सुनवाई हो गयी
पाप और लालच मे वशीभूत इन्सान कर्म भूल गया
लूटने और छीनने मे ही छड़िक राजयोग की लालसा करने लग गया
बे-मशक्कत राजयोग की एक अजीब से क्रान्ति आयी है
मेहनतकशों की दुनियाँ मे बैठकर खाने की प्रवृत्ति छाई है
नसीब का भी अपना ही एक खेल है
पाकर खोने या खोकर पाने का रेलमपेल है
मेहनत के बजाय दिमाग से लक्ष्यभेदन भी एक सहूर हो गया है
गधे जैसी मेहनत से घोड़े की चाल से लक्ष्य की प्राप्ति का दस्तूर हो गया है
बे-मशक्कत राजयोग क्षणिक सुकून का निश्चित विकल्प जरूरी नही होता
अर्जन के तरीकों से किये गये लक्ष्य निर्धारण से निश्चित एक समान धूरी नहीं होता
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











