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फरवरी

विधा – ग़ज़ल

ठिठुरती सर्द रातों का सहारा ले के आया है,
फरवरी खुशबुओं का एक पिटारा ले के आया है।

​न पूरी धूप है इसमें, न पूरी ठंड की शिद्दत,
सुनहरी धूप का मीठा नज़ारा ले के आया है।

​दबे पाँव बसंत आता है, अब बागों की राहों से,
खिले फूलों का हँसता सा, इशारा ले के आया है।

​परिंदे चहचहाते हैं, नए पत्तों की शाखों पर,
फिज़ाओं में मोहब्बत का किनारा ले के आया है।

​गुलों की ज़ुल्फ़ सुलझाने, चलती हैं हवाएं अब,
सुकूँ का दिल की कश्ती में किनारा ले के आया है।

कहीं रंगों की होली है, कहीं वादों का मौसम है,
ये अपने साथ खुशियों का इकतारा ले के आया है।

​नज़र आती है अब हर ओर सरसों की सुनहरी शाम,
धरा पर आसमाँ का हर सितारा ले के आया है।

​किताबों में रखे सूखे गुलाबों को जगाने को,
पुरानी याद का फिर से शरारा ले के आया है।

​बिदा होती हुई ठंडक की ये मखमली सी अंगड़ाई,
सुकून पहुंचने दिल को ये, बहारें ले के आया है।

रीना पटले, शिक्षिका

शास हाई स्कूल ऐरमा, कुरई
जिला -सिवनी मध्यप्रदेश

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