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एकादशी व्रत

1. एकादशी का शाब्दिक और तात्त्विक अर्थ
“एकादशी” शब्द संस्कृत के “एक” (ग्यारह) और “दशी” (तिथि) से मिलकर बना है। यह चंद्र मास की ग्यारहवीं तिथि है, जो शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में आती है। वैदिक चिंतन में ग्यारह संख्या का विशेष महत्व है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन; इन सबका संयम ही आध्यात्मिक साधना का मूल है। इसीलिए एकादशी को इन्द्रियनिग्रह का पर्व कहा गया है।

“उपवास” शब्द का वास्तविक अर्थ है — उप (निकट) + वास (निवास), अर्थात ईश्वर के समीप रहना। अतः केवल भोजन त्याग ही व्रत नहीं, बल्कि विषयों से दूरी और चेतना का ईश्वराभिमुख होना ही इसका तात्त्विक अर्थ है।

शास्त्रों के अनुसार-
“एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोर्भयोरपि”
—पद्म पुराण
अर्थ: दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न त्याग करना चाहिए। इस दिन आहार हल्का और विचार उच्च रखने की परंपरा है। इन्द्रियों की चंचलता को रोककर मन को भक्ति, जप और आत्मचिंतन में लगाना ही एकादशी का वास्तविक उद्देश्य है।

2. शास्त्रों में एकादशी का महत्व
पुराणों और वैष्णव ग्रंथों में एकादशी को अत्यंत पुण्यदायिनी तिथि बताया गया है। इसे पाप-नाशिनी, चित्त-शुद्धिकारी और मोक्षदायिनी कहा गया है। अनेक कथाओं में वर्णन आता है कि एकादशी व्रत के प्रभाव से महान पापी भी धर्ममार्ग पर अग्रसर हुए।

श्लोक:
“एकादशी व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्”
— स्कन्द पुराण
अर्थ: एकादशी व्रत सभी पापों का नाश करता है।
इस दिन भगवान विष्णु की उपासना विशेष फलदायी मानी गई है। शास्त्र कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप से जो फल कठिनाई से प्राप्त होता है, वह एकादशी के व्रत से सहज प्राप्त होता है क्योंकि यह मन को शुद्ध करता है, जो सभी कर्मों का मूल है।

3. एकादशी व्रत क्यों रखना चाहिए? (शास्त्रीय कारण)
एकादशी व्रत आत्मसंयम का अभ्यास है। शास्त्रों के अनुसार अन्न मन को स्थूल बनाता है, जबकि उपवास मन को सूक्ष्मता की ओर ले जाता है। जब पाचन में ऊर्जा कम लगती है, तब चेतना भीतर की ओर मुड़ती है।

श्लोक:
“नास्ति एकादशीसमं पावनं पापनाशनम्”
अर्थ: एकादशी जैसा पवित्र व्रत दूसरा नहीं। यह व्रत हमें इन्द्रियों का दास न बनकर उनके स्वामी बनने की प्रेरणा देता है। नियमित रूप से एकादशी रखने से इच्छाशक्ति प्रबल होती है और भक्ति में स्थिरता आती है।

4. एकादशी व्रत का आध्यात्मिक उद्देश्य
आध्यात्मिक दृष्टि से एकादशी आत्मसंयम का अभ्यास है। केवल भोजन त्यागना इसका लक्ष्य नहीं; बल्कि इन्द्रियों, वाणी और विचारों को भी शुद्ध करना आवश्यक है।

श्लोक:
उपवासः परो धर्मो न केवलं क्षुधानिग्रहः
अर्थ: उपवास केवल भूख रोकना नहीं, बल्कि उच्च धर्म का आचरण है। इस दिन व्यक्ति मौन, जप, ध्यान, सत्संग और शास्त्रपाठ में समय बिताता है। इससे मन की चंचलता घटती है और अंतर्मुखता बढ़ती है। यह व्रत हमें सिखाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल भोग नहीं, बल्कि योग है।

5. एकादशी व्रत और स्त्रियाँ — शास्त्रीय दृष्टिकोण
धर्मशास्त्रों में व्रत का अधिकार स्त्री और पुरुष दोनों को समान रूप से दिया गया है। एकादशी व्रत को लेकर कुछ लोगों की यह धारणा कि यह केवल विधवा स्त्रियों के लिए है, जो कि मिथ्या है, पर हमारे शास्त्रों में कहीं पर भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि इसे केवल विधवा स्त्रियां ही कर सकती हैं। पुराणों और स्मृतियों में व्रत का मूल आधार श्रद्धा और भक्ति बताया गया है, न कि वैवाहिक स्थिति।
शास्त्रों में कहा गया है कि स्त्री, चाहे विवाहित हो, अविवाहित हो या विधवा, यदि वह श्रद्धा से व्रत करे तो उसे समान आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है। व्रत आत्मसंयम और ईश्वर-स्मरण का साधन है, जो सभी के लिए खुला मार्ग है।

शास्त्रों के अनुसार:
“नारी वा यदि वा पुरुषो भक्त्या कुर्यात् उपोषणम्, तस्य पुण्यफलं सम्यग् विष्णुलोके महीयते।”
अर्थ: स्त्री या पुरुष जो भी भक्ति से उपवास करे, वह विष्णुलोक में सम्मान पाता है।
वास्तव में, समाज में विधवाओं के संयमित जीवन के कारण यह भ्रम फैला कि व्रत उन्हीं के लिए है। परंतु धर्मग्रंथ स्पष्ट करते हैं कि एकादशी भक्ति का व्रत है, सामाजिक बंधन का नहीं। इसलिए हर स्त्री, अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार, इसे कर सकती है।

6. किन स्त्रियों को एकादशी व्रत अवश्य रखना चाहिए?
शास्त्रों में विशेष रूप से उन स्त्रियों के लिए एकादशी व्रत को मंगलकारी बताया गया है जो परिवार के कल्याण, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की कामना रखती हैं। गृहस्थ जीवन में स्त्री को “गृहलक्ष्मी” कहा गया है; उसकी साधना पूरे परिवार के वातावरण को सात्त्विक बनाती है।

जो स्त्रियाँ मन की स्थिरता, क्रोध पर नियंत्रण और भक्ति में वृद्धि चाहती हैं, उनके लिए यह व्रत अत्यंत सहायक है। एकादशी का संयम स्त्री के भीतर धैर्य, करुणा और आध्यात्मिक संतुलन बढ़ाता है।

शास्त्रों में कहा गया है:
“पतिव्रता धर्मनिष्ठा एकादश्यामुपोषिता, कुलं तारेत् सदा भक्त्या विष्णुप्रीतिप्रदा भवेत्।”
अर्थ: धर्मनिष्ठ स्त्री द्वारा किया गया एकादशी व्रत परिवार को उन्नति देता है और विष्णु को प्रिय होता है। इसलिए जो स्त्रियाँ अपने जीवन में भक्ति और सदाचार को सुदृढ़ करना चाहती हैं, उनके लिए यह व्रत विशेष रूप से अनुशंसित है।

7. किन स्त्रियों को यह व्रत नहीं करना चाहिए?
धर्म का मूल सिद्धांत है कि साधना शरीर की क्षमता के अनुसार हो। शास्त्रों ने स्पष्ट कहा है कि धर्माचरण से शरीर को हानि नहीं पहुँचनी चाहिए। गर्भवती, स्तनपान कराने वाली, गंभीर रोग से पीड़ित या अत्यंत दुर्बल स्त्रियों के लिए कठोर उपवास उचित नहीं माना गया।

शास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार:
“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।”
अर्थ: शरीर ही धर्म साधना का प्रथम साधन है। ऐसी स्त्रियाँ फलाहार, दूध या हल्का सात्त्विक भोजन लेकर भी व्रत का पालन कर सकती हैं। व्रत का फल भावना और संयम से मिलता है, न कि केवल भूखे रहने से मिलता है। यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे, तो अन्न त्यागकर नामजप, पूजा और सत्संग करना ही पर्याप्त माना गया है।

8. एकादशी व्रत के शास्त्रीय नियम
एकादशी व्रत केवल एक दिन का उपवास नहीं, बल्कि तीन दिनों का संयम माना गया है जो दशमी, एकादशी और द्वादशी तक होता है। दशमी से ही सात्त्विक आहार, ब्रह्मचर्य और संयम का पालन करना चाहिए। एकादशी के दिन अन्न त्याग कर जप, ध्यान, विष्णुपूजन और कथा-श्रवण करना श्रेष्ठ है।

श्लोक:
“दशम्यां नियमं कृत्वा एकादश्यामुपोषयेत्, द्वादश्यां पारणं कुर्यात् विष्णुप्रीत्यै विशेषतः।”
अर्थ: दशमी से नियम लेकर एकादशी को उपवास करे और द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करे। द्वादशी को समय पर व्रत खोलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि व्रत रखना।

9. एकादशी व्रत के प्रकार
शास्त्रों ने एकादशी व्रत को सभी लोगों के लिए सुलभ बनाने हेतु इसके विभिन्न प्रकार बताए हैं। मुख्य रूप से तीन प्रकार प्रचलित हैं — निर्जल, फलाहार और अन्नत्याग व्रत। निर्जल व्रत सबसे कठोर माना गया है, जिसमें जल तक ग्रहण नहीं किया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से निर्जला एकादशी पर किया जाता है, परंतु इसे केवल स्वस्थ और सक्षम व्यक्ति को ही करना चाहिए।

फलाहार व्रत में अनाज का त्याग कर फल, दूध, मेवे या कंद-मूल ग्रहण किए जाते हैं। यह गृहस्थों के लिए अधिक उपयुक्त माना गया है। अन्नत्याग व्रत में केवल धान्य का त्याग कर शेष सात्त्विक आहार लिया जाता है।

शास्त्रीय वचन के अनुसार:
“फलाहारो जलाहारो वा भक्त्या यः कुरुते नरः, तस्य व्रतफलं पूर्णं भवेद् भावसमन्वितम्।”
अर्थ: जो व्यक्ति श्रद्धा से अपनी क्षमता के अनुसार व्रत करता है, उसे पूर्ण फल प्राप्त होता है। अतः व्रत का मूल्य कठोरता में नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और भगवान स्मरण में है।

10. एकादशी व्रत में निषेध
एकादशी व्रत केवल आहार-संयम नहीं, बल्कि आचरण-संयम भी है। शास्त्र कहते हैं कि इस दिन मन, वाणी और कर्म की शुद्धि अनिवार्य है। क्रोध, असत्य भाषण, निंदा, चुगली, हिंसा और विषय-भोग से दूर रहना चाहिए।

शास्त्रानुसार:
“मनसा वाचा कर्मणा शुद्धिः व्रतस्य लक्षणम्।”
अर्थ: मन, वाणी और कर्म की शुद्धि ही व्रत का वास्तविक लक्षण है। इस दिन अधिक सोना, व्यर्थ वार्तालाप और इन्द्रिय विषयों में लिप्त रहना व्रत की भावना के विपरीत माना गया है। जुआ, मद्य, मांस और तामसिक भोजन पूर्णतः निषिद्ध बताए गए हैं। व्रत का उद्देश्य भीतर की जागृति है; अतः दिन को जप, ध्यान, पाठ और सेवा में बिताना श्रेष्ठ माना गया है।

11. स्त्रियों के लिए एकादशी व्रत का विशेष फल
शास्त्रीय परंपरा में एकादशी व्रत को स्त्रियों के लिए विशेष रूप से मंगलकारी बताया गया है, क्योंकि परिवार की आध्यात्मिक धुरी प्रायः स्त्री ही होती है। उसके विचार, भाव और आचरण घर के वातावरण को सात्त्विक दिशा देते हैं। जब स्त्री श्रद्धा, संयम और भक्ति के साथ एकादशी का पालन करती है, तो उसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं, पारिवारिक भी होता है। घर में शांति, संतुलन और सकारात्मकता का वातावरण बनता है।

शास्त्रीय वचन:
“एकादशी व्रतफलात् सौख्यं सौभाग्यमेव च, आयुः आरोग्यसम्पत्तिः विष्णुभक्तिर्विवर्धते।”
अर्थ: एकादशी व्रत से सुख, सौभाग्य, आरोग्य और विष्णुभक्ति में वृद्धि होती है।
यह व्रत स्त्री के भीतर धैर्य, करुणा और मानसिक स्थिरता को पुष्ट करता है। नियमित साधना से मन की चंचलता घटती है और विचारों में स्पष्टता आती है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह व्रत आत्मबल को जागृत करता है, जिससे जीवन की चुनौतियों का सामना संतुलन के साथ किया जा सकता है।
साथ ही, यह समझना आवश्यक है कि व्रत का फल केवल कठोर उपवास से नहीं, बल्कि भावना और निष्ठा से मिलता है।

समाज में एकादशी व्रत को लेकर अनेक भ्रांतियाँ प्रचलित हैं। कुछ लोग मानते हैं कि यह व्रत केवल विधवा स्त्रियों के लिए है, जबकि कुछ के अनुसार केवल भूखे रहना ही व्रत का मुख्य उद्देश्य है। परंतु शास्त्र इन धारणाओं का समर्थन नहीं करते। धर्मग्रंथ स्पष्ट बताते हैं कि व्रत का सार भक्ति, संयम और आत्मशुद्धि है, न कि केवल शारीरिक कष्ट।

“भावग्राही जनार्दनः” — भगवान भाव को ग्रहण करते हैं। अर्थात् व्रत का फल बाहरी कठोरता से नहीं, बल्कि आंतरिक श्रद्धा से प्राप्त होता है। यदि कोई व्यक्ति स्वास्थ्य कारणों से पूर्ण उपवास न कर सके, तो भी जप, ध्यान, सात्त्विक आचरण, सेवा और भगवान विष्णु का स्मरण करके व्रत का आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है।

इसी भावना को ध्यान में रखते हुए, एकादशी तिथि के अनुरूप 11 प्रमुख नियम बताए गए हैं:

एकादशी व्रत के 11 नियम

  1. दशमी से ही सात्त्विक आहार और संयम का पालन
  2. एकादशी के दिन अन्न (विशेषकर चावल) का त्याग
  3. प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा
  4. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या विष्णु मंत्र का जप
  5. गीता, विष्णुसहस्रनाम या कथा श्रवण
  6. क्रोध, असत्य, निंदा और विवाद से दूर रहना
  7. ब्रह्मचर्य और इन्द्रियनिग्रह का पालन
  8. दिन में अधिक निद्रा से बचना, सत्संग में समय देना
  9. दान, सेवा या जरूरतमंद की सहायता करना
  10. द्वादशी को विधिपूर्वक पारण (व्रत खोलना)
  11. पूरे व्रत में अहंकार रहित, शांत और भक्तिभाव बनाए रखना

इस प्रकार, एकादशी व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि जीवनशैली को पवित्र बनाने का अभ्यास है।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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