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डूबे हुए क़दमों की वापसी


मीहर की रात कुछ ज़्यादा ही ठंडी थी
जैसे हवा ने भीतर के डर को अपने साथ समेट लिया हो।
चारों ओर पसरा सन्नाटा ऐसा था मानो गाँव खुद साँस रोककर
किसी पुराने सच के लौटने का इंतज़ार कर रहा हो।
राशिरण, सरगम और गंगाराम चौपाल की बुझी हुई लालटेन के पास बैठे थे।
तीसरी पुकार, तीसरा नाम,
और मिट्टी पर लिखा खून-सा संदेश—
इन सबने मीहर की हवा को बोझिल बना दिया था।
गाँव की साँसें भारी थीं, जैसे हर कोई कुछ जानता हो
पर कोई बोलने की हिम्मत न करता हो।
सरगम ने धीरे से पूछा—
“गंगा… ये सब किस ओर जा रहा है?
ये आवाज़ें, ये पुकारें, ये नाम—
क्या ये सिर्फ़ परछाइयाँ हैं,
या कोई ज़िंदा इंसान भी इसमें शामिल है?”
गंगाराम कुछ देर चुप रहा।
उसकी आँखें अँधेरे में कहीं टिक गईं,
फिर वह बोला—
“परछाइयाँ कभी अकेली नहीं चलतीं, सरगम…
उन्हें हमेशा कोई-न-कोई इंसान दिशा देता है।”
राशिरण ने लंबी साँस छोड़ी—
“मतलब मीहर में कोई है
जो अतीत को फिर से ज़िंदा करना चाहता है?”
गंगाराम ने सिर हिलाया—
“हाँ… कोई ऐसा
जो चाहता है कि दबे हुए सच
फिर से साँस लेने लगें।”
1. अंजना की डायरी का अधूरा पन्ना
उसी वक़्त किशन दौड़ता हुआ आया।
साँस उखड़ी हुई, आँखों में डर और उत्सुकता एक साथ।
“राशिरण भैया! सरगम दीदी!
स्कूल की दीवार पर… कुछ लिखा मिला है!”
तीनों चौकन्ने हो गए।
गंगाराम ने पूछा—
“क्या लिखा मिला, किशन?”
किशन ने डरते हुए कहा—
“लाल रंग से… बहुत बड़ा—
‘अंजना ज़िंदा है।’”
सरगम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“कहाँ लिखा है?” राशिरण ने तुरंत पूछा।
“हमारे पुराने स्कूल की टूटी दीवार पर।
आज सुबह तक वहाँ कुछ नहीं था…
लेकिन शाम को देखा तो लगा
जैसे अभी-अभी लिखा गया हो।”
गंगाराम चुप रहा।
उसकी आँखों में एक पुराना, गहरा डर उतर आया—
वही डर जो बरसों पहले मीहर पर छा गया था।
सरगम ने काँपती आवाज़ में पूछा—
“अंजना की डायरी…
क्या वो किसी के पास हो सकती है?”
राशिरण बोला—
“कहीं किशन ने ही तो नहीं लिखा ये?”
गंगाराम बुदबुदाया—
“जिसने तीसरी पुकार जगाई है…
वही ये आग भी फैला रहा है।”
2. स्कूल की दीवार पर सच की लकीर
तीनों स्कूल पहुँचे।
टूटी दीवार पर टॉर्च की रोशनी पड़ी—
“अंजना ज़िंदा है — सच के रूप में।”
शब्द अजीब तरह से गहरे थे—
जैसे किसी ने उन्हें सिर्फ़ लाल रंग से नहीं,
बल्कि दर्द, ग़ुस्से और अधूरी संवेदनाओं से लिखा हो।
सरगम ने दीवार को छुआ।
दीवार ठंडी थी,
लेकिन अक्षरों पर हल्की नमी थी।
“आज ही लिखा गया है,” उसने कहा।
राशिरण ने पूछा—
“किसने लिखा होगा?”
गंगाराम ने ध्यान से शब्दों को देखा और बोला—
“कोई ऐसा, जो अंजना को जानता था…
और ये भी जानता था
कि वो असल में कौन थी।”
सरगम ने धीमे से कहा—
“लेकिन… अंजना की मौत का पूरा सच
तो किसी को नहीं पता।”
गंगाराम ने उसकी ओर देखा—
“किसी को पता था।
और उसी ने डायरी जलने से पहले
कुछ पन्ने बचा लिए थे।”
3. दीवार के पीछे की फुसफुसाहट
तीनों लौटने लगे।
तभी हवा में एक अजीब-सी फुसफुसाहट गूँजी—
“सुनो… सच अभी अधूरा है।”
सरगम ने पलटकर देखा—
कोई नहीं था।
सिर्फ़ हवा थी,
लेकिन वह हवा कुछ कहना चाहती थी।
गंगाराम ने सिर झुका लिया।
चेहरे पर वही पुराना बोझ लौट आया।
“मुझे लगता है,” वह बोला,
“अब अंजना की कहानी
अपने आप मीहर में लौट रही है।”
राशिरण ने पूछा—
“मतलब?”
गंगाराम ने कहा—
“मतलब ये कि
मीहर की परछाइयाँ
अब सिर्फ़ परछाइयाँ नहीं रहीं।
वे क़दम बनकर लौट रही हैं—
और हर क़दम
किसी न किसी सच को साथ लाएगा।”

आर एस लॉस्टम

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