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कैंसर

कैंसर एक इन्सान को निगलनेवाला कीड़ा है
अर्ध मृत्यु के रूप मे जनम भर की ये एक इंसानी दारुढ़ पीड़ा है

बिमारी है कि घर घर पहुंच महामारी का रूप धारण कर चुका है
मौत से भी बदतर पल पल की मौत का नासूर जीवन बन चुका है

इंसानी अनियमित रहन सहन खान पान बाहरी हवा विलासिता ही इस इंसानी सज़ा का उदगम है धीरे धीरे मिलनेवाली मौत की सज़ा का अत्यंत भीषण गम है

नियमित अनुशासित जीवन के अलावा नहीं कोई बचाव आना है
प्रभु भक्ति सात्विक विचार साधारण जीवन से ही कैंसर को हराना है

बदलाव के इस दौर का ये एक विकृत रूप समाज पर छाया है
पूंजीवादी युग मे भौतिकतावादी रहन सहन का परिणाम लगाव पूंजी की माया है

शुद्ध सादा खानपान नियमित दिनचर्या योग से प्रभु का ध्यान ही कैंसर से बचाव का मार्ग है
जीवन जीने दायित्व निभाने सार्थकता को पाने का ये ही एकमात्र सन्मार्ग है


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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