
कैसे दीपमाला मैं सजाऊॅं ,
कैसे लक्ष्मी को मैं बुलाऊॅं ,
कैसे निज द्वार मैं सजाऊॅं ,
मन हो पाता नहीं साफ है ।
अंधेरा सूनसान यह गली ,
कैसे खेलती यहाॅं लली ,
कैसे दुखड़ा में यह पली ,
कहाॅं प्रकृति का इंसाफ है ।
इंसान मरता है घुटघुटकर ,
बहनें हैं जीतीं लुटलुटकर ,
कैसे होती दरिंदगी यहाॅं ,
माताऍं रोतीं फुट फुटकर ।
कैसी कलियुगी है दरिंदगी ,
मुश्किल में पड़ा जिंदगी ,
कलियुग ने खाया वंदगी ,
इसे ईश्वर कर देते माफ हैं ।
मानवता करते वहन नहीं ,
दरिंदे को जैसे बहन नहीं ,
जीने से बेहतर मर जाना ,
हो पाता अब सहन नहीं ।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।











