
महँगाई की बाढ़ में, डूब रहा हर गाँव,
थाली में उत्सव कहाँ, अम्बर छूते भाव।
मिलावट के मेले में, सच बैठा लाचार,
रोटी जैसे हो गई, अब कोई त्योहार।
ईंधन में ऐसी ज्वाला, जेब हुई कंगाल,
कमर झुकाकर पूछती—“कैसा है खुशहाल?”
डिग्री लेकर घूमते, सपनों के दरबान,
दर-दर दस्तक दे रहे, बंद पड़े सम्मान।
वादों की बारात है, अवसर फिर भी क्रूर,
आँकड़ों के सिंहासन पर, बैठा झूठ प्रचुर।
कारोबार सिमट गए, वादे हुए उधार,
बेरोज़गारी हँस पड़ी—“मैं ही असली सरकार।”
–ऋचा चंद्राकर महासमुंद











