
विधा-काव्य
जाना तो नियत है हर एक का इस संसार मे पर कोयल का चहचहाना थम जायेगा ना सोचा था इस मीनार मे
असम्भव सम्भव कैसे हुआ ना जाना था रब तेरे दरबार मे काश कि समय पीछे हो जाये और हम डूब जाये तेरे सुर के बहार मे
दीदी लौट आओ अब हम रहे गये तन्हा इस संसार मे है रब लौटा दो दीदी को ना रह पायेंगे इस बयार मे
स्वर सम्राज्ञीं है आप माँ सरस्वती का रूप है
कंठों मे समाकर ताई आपके संगीत का निखर जाता स्वरूप है
संगीत का एक संसार चला गया
दीदी आप क्या गयी सुरों का मानो निखार ही चला गया
है रब तुझे तेरे रब दी वास्ता सुन ले हमारी अर्ज इस खुमार मे दीदी खुमारी हमारी चली गयी तेरे इस प्यार मे
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











