Uncategorized
Trending

सरदारों की गुप्त सभा और पहली धमकी

मिहिर की रात पहले भी कई बार डरावनी रही थी,
पर आज की रात—
अँधेरा कुछ और ही कह रहा था।
जैसे हवा में घुला सन्नाटा भी
किसी आने वाले तूफ़ान का
इंतज़ार कर रहा हो।
तीसरी पुकार,
दीवार पर उभरा लाल सच,
और अंजना का नाम—
इन सबने
गाँव के सत्ताधारी चेहरों,
यानी सरदारों के मन में
पहली बार झनझनाहट पैदा कर दी थी।
1. चौपाल के पीछे की टूटी कोठरी
जहाँ हर षड्यंत्र की शुरुआत होती थी,
वहीं—
चौपाल के पीछे की पुरानी, टूटी कोठरी में
गाँव के चार सरदार
इकट्ठा हुए थे—
भोलाराम,
रघुवंश,
धरिलाल
और जुलीकार।
दरवाज़ा बंद था।
अंदर एक जली हुई लालटेन
धीरे-धीरे साँस ले रही थी।
भोलाराम ने एक दम में बीड़ी सुलगाई—
“बहुत हो गया!
ये पुकारें, ये परछाइयाँ,
और ये लिखावटें…
किसी ने गाँव का दिमाग़ खराब कर दिया है!”
धरिलाल बोला—
“मुझे तो लगता है
कोई हमारे खिलाफ़ खेल रहा है।
ये सब यूँ ही नहीं हो सकता।”
रघुवंश ने धीमे,
लेकिन कड़े स्वर में कहा—
“सवाल ये नहीं कि कौन कर रहा है।
सवाल ये है
कि क्या वो हमारे पुराने राज़ जानता है?”
लालटेन की लौ
जैसे इस सवाल से काँप उठी।

  1. वापसी सिर्फ़ परछाइयों की नहीं
    जुलीकार ने कहा*

“अंजना…
उसका नाम बार-बार क्यों आ रहा है?”
उसने चारों की ओर देखा—
“तुम सब जानते हो
उस रात क्या हुआ था।
और उसे चुप कराने में
हम सब शामिल थे।”
कोठरी में
एक घना सन्नाटा भर गया।
अब वहाँ
सिर्फ़ अपराध की गंध तैर रही थी।
भोलाराम ने दाँत भींचे—
“अगर किसी ने
अंजना की डायरी के पन्ने
बचा लिए हैं…
तो समझ लो—
हमारी चिता की लकड़ी
तैयार है।”
रघुवंश झल्लाया—
“तो करें क्या?
किस-किस पर शक है?”
धरिलाल ने पहला नाम लिया—
“गंगाराम।”
सब चौंक गए।
“मरा हुआ लौट आया है,
आवाज़ें सुनता है,
लोग उस पर भरोसा करने लगे हैं।
अगर वो सच खोजने पर उतर आया…
तो हम सब खत्म।”
जुलीकार ने दूसरा नाम लिया—
“सरगम।
अंजना की सबसे करीबी थी।
लड़की है,
पर सवाल पूछने से नहीं डरती।”
भोलाराम ने तीसरा नाम जोड़ा—
“राघवरण।
सीधा-सादा है,
पर अगर सच जान गया
तो वही हमारी बर्बादी का
बिगुल बजा देगा।”
कुछ पल की चुप्पी के बाद
रघुवंश बोला—
“और चौथा?”
जुलीकार ने बहुत धीमे से कहा—
“वो…
जो दिखता नहीं,
पर सब देख रहा है।
वही जिसने दीवार पर लिखा है।”
3. पहली धमकी — जो पत्तों में छिपी आई
बैठक खत्म ही होने वाली थी
कि कोठरी के बाहर
कदमों की आहट हुई।
सब एक साथ चुप हो गए।
भोलाराम गरजा—
“कौन है बाहर?”
कोई जवाब नहीं।
रघुवंश ने दरवाज़ा खोला—
बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ़ हवा चल रही थी।
लेकिन उसी हवा के साथ
एक पत्ता उड़कर आया
और भोलाराम के पैरों से टकराया।
पत्ते पर
काले कोयले से लिखा था—
“सच को रोक नहीं सकते।
अगला नाम
तुममें से एक का है।”
धरिलाल का गला सूख गया।
जुलीकार का हाथ काँपने लगा।
रघुवंश की आँखें फैल गईं।
भोलाराम ने पत्ता उठाया
और गुस्से से मसल दिया—
“ये हवा नहीं…
ये चुनौती है!”
4. सरदारों का फैसला
रघुवंश ने दाँत भींचकर कहा—
“गंगाराम को रोको।
उसे डराओ।
अगर न माने…
तो खत्म कर दो।”
धरिलाल बोला—
“सरगम को चुप कराओ।
और राघवरण को
हमारे खिलाफ़ खड़ा होने से पहले
तोड़ दो।”
जुलीकार ने कहा—
“और वो जो छिपकर लिख रहा है—
उसे ढूँढो।
वही इस कहानी की चाबी है।”
भोलाराम की आँखें लाल हो उठीं—
“और याद रखो…
सच को जितना दबाओगे,
वो उतना ही मज़बूत होकर लौटेगा।
इससे पहले कि वो हमें निगल जाए—
हमें उसे
हमेशा के लिए दफ़न करना होगा।”
चारों कोठरी से बाहर निकल गए।
लेकिन किसी ने नहीं देखा—
कि कोठरी के एक कोने में,
पुरानी दीवार के पीछे
दो शांत आँखें
सब कुछ देख रही थीं।
वही आँखें,
जो वर्षों से
एक चुप युद्ध
देख रही थीं।

आर एस लॉस्टम

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *