
खुदा की मंज़ूरी का एक सिरा अभी बाकी था,
कि समय के साथ दुआओं का संचार होने लगा।
‘फिर मिलेंगे कभी’— बस इसी एक उम्मीद से,
खामोश दिल में मिलन का आग़ाज़ होने लगा।
मैं आज भी पेड़ की टहनियों से सिर टिकाए,
उमड़ते बादलों में तुम्हारा अक्स ढूँढती हूँ।
वहाँ… बादलों के बीच, एक रुखड़ी सूखी लकड़ी,
दीवार की चार ईंटों के बीच सीलन से भरी धँसी है,
जो किसी गर्म ‘आँच’ के स्पर्श का इंतज़ार करती है।
मैं खड़ी हूँ एक लंबी कतार में,
हाथों में मोहब्बत की रजिस्ट्री का इकरारनामा लिए,
अपनी बारी की प्रतीक्षा में।
इंतज़ार है— भीड़ के छँटने का,
इंतज़ार है— तुम्हारे अंतिम फैसले का।
अंगूर की लताओं के पास कोई चुपचाप खड़ा है,
शायद उसे भी अयोध्या जाने का लंबा इंतज़ार है।
बारिशों के लौटने और रेत में घर बनाने का,
भीड़ में छुपकर मुस्कुराने और हाथ दबाने का,
तुम्हारी हथेली की उलझी रेखाओं को गिनने का,
मुझे बस… तुम्हारा इंतज़ार है।
चाहती हूँ, अपने समय के सच को,
सफ़ेद कागज़ पर ‘फोटोस्टेट’ कर दूँ।
पूरे पन्ने पर बस हमारी मुलाकातों का सच दर्ज हो,
वक्त आने पर दूरियों की हर साज़िश सुलझ जाए,
और मेरी हर सुबह तुम्हारे नाम से ‘व्यवस्थित’ हो जाए।
©️®️ रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश











