
जयशंकर प्रसाद हिंदी कवि, नाटककार, कहानीकार तथा निबंध लेखक थे। वे हिंदी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में उनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। वह एक युग प्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरवान्वित होने योग्य कृतियां दी है। उन्होंने अपने विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन कलात्मक रूप में किया है।
” आह!वेदना मिली विदाई
मैंने भ्रमवश जीवन संचित
मधुकरियों की भीख लुटाई
छलछल थे संध्या के श्रमकण
आंसू से गिरते थे प्रतिक्षण
मेरी यात्रा पर लेती थी
भीगता अनंत अंगड़ाई”
कवि देवसेना के मुख से अपने जीवन के अनुभव को व्यक्त करना चाह रहा है जिसमें वह छोटी-छोटी बातों को भी शामिल करना चाहता है। आज मेरे दर्द को मुझसे विदाई मिल गई जिस भ्रम में रहकर मैंने जीवन भर आशाओं और कामनाओं को इकट्ठा किया उसे मैंने भीख में दे दिया।
देवसेना का गीत प्रसाद जी के नाटक स्कंद गुप्त का अंश है। हूणों के हमले में अपने भाई और मालवा के राजा बंधु वर्मा तथा परिवार के सभी लोगों के वीरगति पानी और अपने प्रेम स्कंदगुप्त द्वारा ठुकराए जाने से दुःखी देवसेना जीवन के आखिरी मोड़ पर आकर अपने अनुभव में अर्जित दर्द भरे क्षणों को स्मरण करके गीत गा रही है।इसी दर्द को कभी देर से ना के मुख से व्यक्त कर रहा है। कवि देवसेना के मुख से उसके बीते हुए दोनों को अर्थात देवसेना के यौवन काल पर प्रकाश डाल रहे हैं।
देवसेना कह रही है कि जिसे मैं भ्रम वंश संभल के रखा था, वह आज मेरे किसी काम नहीं आई। देवसेना अपने बीते हुए जीवन पर दृष्टि डालते हुए अपने अनुभवों में जमा पीड़ा के पलों को याद कर रही है।
इस गीत में माधुर्यगुण, लक्षणा शब्द शक्ति, अनुप्रास अलंकार, चित्रात्मक भाषा शैली एवं सरल स्पष्ट शब्दों का प्रयोग किया गया है।
जीवन की संध्या बेला अर्थात जीवन के अंतिम पड़ाव में देवसेना गीत गाकर भिक्षा मांगती हुई अपना जीवन यापन करती है।
भाव यह है कि जीवन भर संघर्षरत रहती हुई देवसेना सुख की आकांक्षा लिए मीठे सपने देखती रही जब उसके सपने पूरे ना हो सके तो वह थक कर निराश होकर अपनी आकांक्षाओं से विदा लेती हुई उससे मुक्त हो जाना चाहती है। ऐसी स्थिति में भी करुण भरे गीत की तरह वियोग का दुःख उसके हृदय को कचोट रहा है। देवसेना
कहती है कि युवावस्था में मैं तो सब की तृष्णा भरी दृष्टि अर्थात प्यासी नजरे मेरे ऊपर फिरती रहती थी, परन्तु यह मेरी आशा बावली तूने मेरी सारी कमाई हुई पूंजी नहीं खो दी।
डॉ मीना कुमारी परिहार











