Uncategorized
Trending

राज के नीचे दबी आख़िरी चिंगारी


रात बहुत गहरी थी—
इतनी कि अँधेरा भी अपने ही भार से काँप रहा था।
हवा में ठंड नहीं थी,
बल्कि एक अजीब-सी ख़ामोशी तैर रही थी—
ऐसी ख़ामोशी
जो किसी तूफ़ान से पहले जन्म लेती है।
बिहार के लोग थक चुके थे—
रोते-रोते,
लड़ते-लड़ते,
और सबसे ज़्यादा…
चुप रहते-रहते।
पर इतिहास की मिट्टी में
एक नियम हमेशा ज़िंदा रहता है—
जहाँ हर तरफ़ राज दबा हो,
वहीं कहीं न कहीं
कोई चिंगारी ज़रूर बची रहती है।

  1. ख़ून और ख़ामोशी का अंत
    अंजना ने पहली बार महसूस किया—
    कि गाँव के बुज़ुर्ग अब डर से नहीं,
    बल्कि पछतावे से चुप हैं।
    राजन, विनोद, सुशांत, मास्टर साहब—
    सबके भीतर
    कुछ टूट चुका था।
    लेकिन टूटने के बाद
    जो बचता है,
    अक्सर वही सबसे मज़बूत होता है।
    रात के चौथे पहर
    अंजना चौपाल में अकेली खड़ी थी।
    धीरे-धीरे लोग जुटने लगे—
    कोई मशाल लेकर,
    कोई लाठी,
    और कुछ केवल
    अपनी डरी हुई साँसों के साथ।
    अंजना ने पहली बार
    बिना काँपे कहा—
    “आज अगर हम चुप रहे,
    तो आने वाली पीढ़ियाँ
    हमें कायर लिखेंगी।”
    उसकी आवाज़ नहीं टूटी।
    लोगों के दिल टूटे थे—
    पर हिम्मत नहीं।
  2. सच उभरा… पाप काँपा… परछाइयाँ टूटीं
    उस रात गाँव दो हिस्सों में बँट गया—
    एक तरफ़ वे,
    जो बरसों से अत्याचार करते आए थे।
    दूसरी तरफ़ वे,
    जो पहली बार
    अपनी पीठ सीधी करके खड़े हुए थे।
    यह युद्ध नहीं था—
    यह फ़ैसला था।
    कि आगे
    डर चलेगा
    या इंसान।
    महाराज सिंह—
    जो वर्षों से डर का दूसरा नाम थे—
    पहली बार
    भीड़ के सामने अकेले खड़े थे।
    उनके चेले भाग चुके थे।
    जो बचे थे,
    उनकी आँखों में
    पहली बार कंपन था।
    अंजना ने बस एक वाक्य कहा—
    “हम ख़ून से बदला नहीं लेंगे—
    हम इंसाफ़ लेंगे।”
    शब्दों में आग थी—
    पर वह आग
    जलाने की नहीं,
    रास्ता दिखाने की थी।
  3. इंसाफ़ की शुरुआत
    राज्य की टीम पहुँची।
    पुलिस आई।
    जाँच बैठी।
    लेकिन इस बार
    गाँव डरकर भागा नहीं—
    गवाह बनकर खड़ा हुआ।
    पुराने दस्तावेज़ खुले।
    दबी गवाहियाँ उजागर हुईं।
    महाराज सिंह समेत
    उनके कई सिपहसालार गिरफ़्तार हुए।
    बिहार में पहली बार
    यह बात फैली—
    कि अत्याचार हमेशा नहीं चलता।
    एक दिन
    उसके पैरों तले की ज़मीन
    ढह ही जाती है।
    4. चिंगारी जो राख से उठी शांति लौटी—
    पर यह वह शांति नहीं थी
    जो डर के बाद आती है।
    यह शांति
    मेहनत की थी,
    संघर्ष की थी,
    और उन लोगों की थी
    जिन्होंने सदियों बाद
    सर उठाया था।
    अंजना अदालत के काग़ज़
    हाथ में लेकर
    सीढ़ियों से बाहर निकली।
    सूरज वही था—
    पर सुबह अलग थी।
    राजन ने धीमे से पूछा—
    “अब क्या करेंगे, दीदी?”
    अंजना मुस्कुराई—
    “अब गाँव बनाएँगे—
    घाव नहीं।”
  4. कहानी का अंत नहीं—पूर्णता
    बिहार की ज़मीन ने
    बहुत ख़ून देखा है।
    पर इतिहास
    सिर्फ़ ख़ून याद नहीं रखता—
    वह उन्हें भी याद रखता है
    जो राख से उठते हैं।
    और इस बार—
    बिहार सिर्फ़ ज़मीन नहीं था।
    वह एक गवाही था।
    एक सबक था।
    एक नई शुरुआत था।
    कहानी यहाँ ख़त्म नहीं हुई—
    यहाँ
    पहली बार
    शुरू हुई।
    आर एस लॉस्टम

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *