
रोज़ डे, प्रपोज़ डे, वेलेंटाइन का शोर,
दिनों में सिमट गया क्या प्रेम का पूरा दौर?
जो भाव मन में पनपते थे संस्कारों के संग,
आज वो ट्रेंड बन गए, बस एक टैग के रंग।
हम पूछते हैं चुपचाप, डरते हुए सवाल—
क्या बच्चों ने चुना ये रास्ता, या हमने ही किया हलाल
अपनी सनातन सीखों का, अपने ही हाथों से,
या बताना भूल गए हम उन्हें प्रेम किस बात से?
जहाँ प्रेम था संयम, सम्मान और त्याग,
जहाँ रिश्ता वचन से बंधता था, न क्षणिक अनुराग।
आज स्क्रीन ने सिखाया जल्दी चाहो, जल्दी छोड़ो,
और रिश्तों को भी मौसम की तरह मोड़ो।
दोष बच्चों का नहीं, न समय को देना है,
आईना हम हैं—ये स्वीकार करना है।
अगर घर में संस्कार बोलते, व्यवहार में दिखते,
तो बाज़ार के शब्द मन में कहाँ टिकते?
नए दिनों से डर नहीं, डर जड़ों के खोने का है,
प्रेम को समझे बिना बस मनाने का है।
अगर आज हम समझा सकें—न टोकें, न रोकेँ,
तो कल की पीढ़ी खुद पहचानेगी अपने लोक।
क्योंकि सनातन कोई बोझ नहीं, पहचान है हमारी,
और प्रेम कोई दिन नहीं—पूरी उम्र की जिम्मेदारी।
आर एस लॉस्टम











