
(35 वर्षों का सफर)
आज हमारी शादी को पैंतीस साल हो गए,
जीवन के कितने मौसम आए और चले गए।
समय चुपचाप चलता रहा, हम संग चलते रहे,
सुख हो या दुःख — हर मोड़ पर हाथ थामे रहे।
जब जीवन की राह नई थी, सपने भी अनजाने थे,
ना रिश्तों की समझ थी, बस मन सच्चे दीवाने थे।
धीरे-धीरे दिन बदले, जिम्मेदारियाँ घर में आईं,
हँसी के संग चिंताओं ने भी चुपके जगह बनाई।
मेरी जीवनसंगिनी शांती, तुमने कभी कुछ माँगा नहीं,
जो मिला उसी में खुश रहीं, कोई शिकवा जताया नहीं।
अपने हिस्से की थकान छुपाकर सबको आराम दिया,
परिवार की हर खुशी के लिए खुद को समर्पित किया।
हम दो, हमारे चार बच्चे — घर हँसी से भर जाता था,
दो बेटियाँ, दो बेटों से आँगन महक उठ जाता था।
किलकारियों की मीठी धुन से हर कोना सजता था,
बच्चों की प्यारी मुस्कानों में हर सपना बसता था।
फिर समय ने पंख लगाए, वे नन्हे कदम बड़े हो गए,
दोनों बेटियाँ विदा होकर अपने ससुराल चले गए।
उनकी यादें आज भी दिल की चौखट पर आ जाती हैं,
उनकी हँसी की मधुर गूँज अब भी घर में सुनाई देती है।
अब दोनों बेटे जीवन की राह बनाने में लगे हुए हैं,
हमारी सीख और दुआओं के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।
उनकी मेहनत में दिखता है संस्कारों का उजियारा,
उनके उज्ज्वल भविष्य में झलकता है विश्वास हमारा।
कभी हाथ उम्मीद ने थामा, कभी विश्वास सहारा बना,
टूटते हौसलों के बीच दोनों का साथ ही किनारा बना।
जब थककर कदम रुके, तो एक-दूजे ने संभाला,
चुप रहकर भी आँखों ने हर दर्द का हाल बताया।
न बड़े सपनों की ज़िद थी, न शिकायतों का शोर था,
थोड़े में ही खुश रहना ही हमारा सबसे बड़ा जोर था।
यही सादगी, अपनापन, रिश्तों की असली पहचान रही,
इसी ने इन पैंतीस वर्षों की हर मुश्किल आसान करी।
आज पीछे मुड़कर देखते हैं तो मन भर आता है,
संघर्षों के बीच खिला प्रेम ही सबसे सुंदर गाथा है।
शांती, इस जीवन यात्रा में तुमने जो साथ निभाया है,
उसके आगे हर धन्यवाद का शब्द छोटा पड़ जाता है।
इन पैंतीस वर्षों की बस इतनी सी पहचान रहे,
शांती के संग अब जीवनभर दिल में शांति बनी रहे।
हर सुबह तुम्हारी मुस्कान से घर में उजियारा रहे,
तेरा–मेरा साथ यूँ ही प्रेम का सदा सहारा रहे।
योगेश गहतोड़ी “यश”











