
माँ जब पापड़ बेलती है
तो सिर्फ आटा नहीं फैलता,
फैल जाती हैं
उसकी उँगलियों की थकान,
धूप में सूखते सपने,
और घर की पूरी उम्र।
चकले पर घूमती बेलन
जैसे समय को गोल-गोल घुमा देती है—
कल की भूख,
आज की मेहनत,
कल के लिए बचाई हुई उम्मीद।
पतली होती परतों में
दिखती है उसकी चुप्पी,
जिसमें नमक जितना धैर्य
और जीरा जितनी हिम्मत मिली रहती है।
आँगन की धूप
धीरे-धीरे पढ़ लेती है
उसके हाथों की रेखाएँ,
हर पापड़ पर
एक अदृश्य हस्ताक्षर छोड़ देती है माँ।
हम तो बस स्वाद चखते हैं,
कुरकुरेपन में ढूँढ़ते हैं मज़ा,
पर नहीं सुन पाते
उस बेलन की धीमी आवाज़—
जो कहती है
रोटी के बाद
घर को जोड़ने का दूसरा नाम
पापड़ बेलना है।
रचनाकार
कौशल
छत्तीसगढ़
मुड़पार चु











