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राख़ में दबी साँसें

सुबह की रोशनी किसी बीमार शरीर पर रखी गुनगुनी पट्टी जैसी थी—
धीमी, थकी हुई, और अनमनी।
वैसी ही धूप उस मदन बिहार पर उतरी थी।
रात की उथल-पुथल के बाद
गाँव के आँगन में अजीब-सी ख़ामोशी फैल गई थी।
गायें धीरे-धीरे चर रही थीं,
पग अपनी बाँध से जैसे ज़ोर खो चुके हों।
पूरा गाँव मानो किसी बेचैन सपने से
धीरे-धीरे जाग रहा हो।
अंजना नदी के किनारे बैठी थी।
पानी में उसकी परछाईं टूटी हुई, मद्धम लग रही थी—
मानो नदी भी उसका बोझ महसूस कर रही हो।
राजन दूर से आती पगडंडी पर
अपने कदमों से धूल उड़ाता हुआ
अंजना के पास आकर रुका।
“नींद आई?” उसने पूछा।
अंजना ने हल्का-सा सिर हिलाया।
“नींद तब आती है,
जब भीतर शांति हो,” वह बोली।
“बिहार के अंदर अभी सौ बरस की बेचैनी दबी है।”
राजन चुप रहा।
वह जानता था—
यह लड़की अब सिर्फ़ अपनी लड़ाई नहीं लड़ रही थी,
वह पूरे गाँव की आत्मा से जूझ रही थी।
कुछ पल दोनों बिना बोले बैठे रहे।
सिर्फ़ बहते पानी की धीमी आवाज़
साथ दे रही थी।
राजन ने अंततः कहा—
“गंगाराम ने पंचायत बुलाने को कहा है।
वह कहता है—
आज फैसला नहीं हुआ,
तो बिहार फिर उसी अँधेरे में लौट जाएगा।”
अंजना ने पानी की ओर देखते हुए
धीरे से कहा—
“कभी-कभी सच नदी की तरह होता है, राजन…
बहता रहता है,
पर उसके रास्ते में मिट्टी, कीचड़, खून—
सब जम जाते हैं।
सालों तक कोई उस तक पहुँच ही नहीं पाता।”
राजन ने पूछा, “और अब?”
अंजना ने गहरी साँस ली।
उसकी आवाज़ सख़्त हो गई—
“अब हमें नदी को साफ़ करना होगा,
चाहे उसकी कोई भी क़ीमत हो।”
तभी पीछे से गंगाराम की आवाज़ आई—
“क़ीमत हमेशा खून की ही चुकानी पड़ती है, बेटी।”
दोनों ने मुड़कर देखा।
गंगाराम खड़ा था—
कमज़ोर, दुबला,
पर भीतर कहीं जलती आग के साथ।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और बोला—
“आज का दिन आसान नहीं होगा।
जो सच तुम उजागर करोगी,
उसके पीछे ऐसे लोग खड़े हैं
जो सब कुछ कुर्बान कर देंगे—
पर अपनी सच्ची दुनिया को
दुनिया के सामने नहीं आने देंगे।”
अंजना शांत स्वर में बोली—
“दुनिया को नहीं…
इस गाँव को बताना है।”
गंगाराम मुस्कुराया—
दुख से भरी हुई,
लेकिन गर्व से चमकती मुस्कान।
“पहली बार…
बिहार एक लड़की के पीछे खड़ा है,” उसने कहा।
राजन बोला—
“लेकिन हर कोई नहीं।
कुछ लोग हवेली में जमा हो रहे हैं—
बलदेव सिंह, उसका बेटा,
और कुछ पुराने चेहरे।”
अंजना ने सिर उठाया।
उसकी आँखें दृढ़ संकल्प से चमक उठीं।
“तो हम भी तैयार हैं,” उसने कहा।
“आज से लड़ाई शुरू होती है—
सिर्फ़ न्याय की नहीं,
बिहार की आत्मा को ज़िंदा करने की।”
गंगाराम ने सिर हिलाया।
तभी दूर किसी सूखी डाल से
एक कौआ फड़फड़ाकर उड़ा।
उसकी आवाज़ ने
सुबह की शांत हवा को चीर दिया।
गाँव पर
आने वाले तूफ़ान की
पहली चेतावनी उतर गई।
गंगाराम धीरे से बोला—
“राख ठंडी दिखती है,
पर उसके नीचे साँसें
हमेशा जलती रहती हैं।
बिहार की राख में…
आज बहुत-सी पुरानी साँसें जागेंगी।”
अंजना खड़ी हुई।
उसने आसमान की ओर देखा—
धूप अब थोड़ी तेज़ हो चुकी थी।
“चलो,” उसने कहा,
“पंचायत हमारा इंतज़ार कर रही है।”
तीनों पगडंडी पर आगे बढ़े—
धीरे,
पर दृढ़ क़दमों से।
उनकी परछाइयाँ साथ-साथ लंबी होती गईं,
और पूरा बिहार
एक नए दिन,
एक नई लड़ाई,
और एक नई कहानी की ओर
चल पड़ा।

आर एस लॉस्टम

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