Uncategorized
Trending

अंधी दौड़

जिधर भी देखो यहां आगे बढ़ने को लगी है अंधी दौड़।
युवा भविष्य को लेकर आशंकित, करें श्रम जी तोड़।
अंधी दौड़ में बोलबाला पैसे का, पैसे बिन कैसी दौड़।
कोटा तक दौड़ लगवाएं मात-पिता,लगी भयंकर होड़।

बढ़ी इच्छाएं पूरी करने को, पांव बाहर नहीं लंबी सौर।
शिक्षा ने लिए मात-पिता निचोड़,अज्ञात राह अंधी दौड़।
धनहीन कोई बिरला, छात्र सफल होता होगा इस होड़।
ईश्वर ने बौद्धिक बल न दिया,हिम्मत टूटे कैसे ढूंढें तोड़।

कंपीटिशन खुली दुकानें मात-पिता की जमा पूंजी लूटें।
दुःख तब होता सपने बिखरें, छिने आश्रय उनके छूटे।
चहुं दिशा है आपा-धापी, डिग्री ले जब युवा सड़कें लूटें।
धन-धन करते घर-घर भाई छूटे, कहें देव पितृ हैं रूठे।

हिल गया सामाजिक ताना-बाना नहीं रहा प्रेम पुराना।
नशा करें नर-नारी, कहें प्रगति का अब आया ज़माना।
आगे बढ़ने की अंधी दौड़,खुल गए समरसता के जोड़।
पूरी धरा पर आपा-धापी, सब चाहिए करोड़ों-करोड़।
–महेश शर्मा, करनाल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *