
कितने रंग, कितने ढंग हैं प्रेम के,
हर धड़कन में कितने संग हैं प्रेम के।
कभी उमंग बनके लहराता मन में,
कभी शांत गहरे तरंग हैं प्रेम के।
कभी विरह की रातों का सन्नाटा,
कभी मिलन के मधुर प्रसंग हैं प्रेम के।
कभी त्याग की अग्नि में तपता हुआ,
कभी शीतल छाया के अंग हैं प्रेम के।
कभी नज़र में छुपा इकरार बनकर,
कभी ख़ामोश दिल के जंग हैं प्रेम के।
कभी आराधना, कभी समर्पण,
कभी जीवन के अनंत रंग हैं प्रेम के।
‘रूपेश’ जो समझे इसे आत्मा से,
उसे दिखते हर ओर ढंग हैं प्रेम के।
आर एस लॉस्टम











