
लड़खड़ाती पैरों मे थे जब,
उंगली पकड़ कर चलना
सिखाया था आपने पापा
जब रोते थे सिसक सिसक कर
एक दो पैसे देकर चुप कराते थे,
नहीं गिराना आंसू बेटा अनमोल है,
कहकर सिखाया है आपने पापा,
कैसा था परिस्थिति हमारा,
फिर भी नहीं हिम्मत हारा
दृढ़ संकल्प लेकर आगे बढ़ना,
संघर्ष को साथी बनाना,
सिखाया है आपने पापा ,
सबसे अच्छा बात करो,
सबको अपना मानो,
भेदभाव न किसी से करना,
ये संस्कार दिया है आपने पापा,
कितनी उलझने आने के बाद भी,
हर समस्या को सुलझाया,
नहीं रहता था स्कूल फीस जेब मे,
फिर भी आगे पढ़ाया आपने पापा,
बेटियां अरमान हमारी,
नव जीवन निर्माण करेगी,
ये दो लब्ज़ सुनाया है आपने पापा,
मेरी छोटी गलती पे कोई उंगली उठाए,
पर आपकी आवाज मुझे माफ कर,
हमेशा एक नयी राह दिखाया है आपने पापा
नलिनी शैलेन्द्र दास
सरायपाली छत्तीसगढ़











