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एक राष्ट्र–एक चुनाव

संसदीय समिति की पहल और व्यापक विमर्श
भारत में चुनावी सुधारों की चर्चा समय-समय पर होती रही है, किंतु “एक राष्ट्र–एक चुनाव” का विचार हाल के वर्षों में विशेष रूप से केंद्र में रहा है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव न केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि इसे राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक दक्षता से भी जोड़ा जा रहा है। इसी संदर्भ में गठित संसदीय समिति द्वारा आर्थिक विशेषज्ञों और राज्यों की राय लेने की पहल इस विषय को और अधिक गंभीर तथा समावेशी बनाती है।

“एक राष्ट्र–एक चुनाव” का मूल उद्देश्य देश में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित करना है। वर्तमान व्यवस्था में विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समय पर चुनाव होते हैं, जिससे बार-बार आचार संहिता लागू होती है और शासन-प्रशासन की गति प्रभावित होती है। इस व्यवस्था में चुनावी खर्च भी अत्यधिक होता है।
इसी विषय पर केंद्र सरकार ने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता पूर्व राष्ट्रपति Ram Nath Kovind को सौंपी गई। इस समिति का उद्देश्य संवैधानिक, प्रशासनिक और आर्थिक पहलुओं का अध्ययन कर ठोस सिफारिशें प्रस्तुत करना है।

समाचार के अनुसार, “एक राष्ट्र–एक चुनाव” पर गठित संसदीय समिति अब आर्थिक विशेषज्ञों और राज्यों से भी राय ले रही है। यह कदम लोकतांत्रिक परामर्श की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। किसी भी बड़े संवैधानिक परिवर्तन से पहले विभिन्न पक्षों—राजनीतिक दलों, न्यायविदों, अर्थशास्त्रियों और राज्य सरकारों—की सहमति और सुझाव आवश्यक होते हैं। समिति द्वारा पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और संवैधानिक विशेषज्ञों से विचार-विमर्श किया जा चुका है। अब आर्थिक विशेषज्ञों से चर्चा का उद्देश्य यह समझना है कि एक साथ चुनाव कराने से सरकारी व्यय, विकास योजनाओं और प्रशासनिक निरंतरता पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

लाभ आर्थिक बचत: बार-बार चुनाव कराने में होने वाले भारी खर्च में कमी आएगी। नीतिगत स्थिरता: लगातार चुनावी माहौल समाप्त होने से सरकारें दीर्घकालिक नीतियों पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी। प्रशासनिक दक्षता: आचार संहिता के कारण विकास कार्यों में आने वाली रुकावट कम होगी। राजनीतिक स्थिरता: एक निश्चित चुनावी चक्र से शासन में निरंतरता बनी रहेगी।

हालाँकि, इस प्रस्ताव को लेकर कुछ गंभीर चिंताएँ भी व्यक्त की गई हैं—संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी। यदि किसी राज्य की सरकार मध्यावधि में गिर जाए तो क्या व्यवस्था होगी? संघीय ढाँचे पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
क्या सभी राजनीतिक दल इस पर सहमत होंगे? कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण और संघीय देश में एक साथ चुनाव कराना व्यावहारिक रूप से जटिल हो सकता है।

भारत का संविधान संघीय ढाँचे पर आधारित है, जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन स्पष्ट है। “एक राष्ट्र–एक चुनाव” की व्यवस्था इस संतुलन को प्रभावित कर सकती है, यदि राज्यों की स्वायत्तता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़े। इसलिए राज्यों की राय लेना अत्यंत आवश्यक है, जिससे सहमति आधारित समाधान निकल सके।
निष्कर्ष “एक राष्ट्र–एक चुनाव” का विचार प्रशासनिक सुधार और आर्थिक बचत की दृष्टि से आकर्षक प्रतीत होता है, किंतु इसके संवैधानिक और राजनीतिक आयाम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। संसदीय समिति द्वारा आर्थिक विशेषज्ञों और राज्यों से राय लेना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करता है और यह संकेत देता है कि सरकार इस विषय पर व्यापक सहमति बनाने का प्रयास कर रही है। अंततः, किसी भी बड़े सुधार की सफलता संवाद, सहमति और संवैधानिक संतुलन पर निर्भर करती है। यदि सभी पक्षों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, तो यह पहल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकती है।

कृष्ण कान्त कपासिया

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