
बचपन में
जब हम धूल में लथपथ
गिल्ली-डंडा खेलते थे,
और माँ दूर से आवाज़ देती थी—
“बस करो अब, किताब खोलो…”
तब दादा जी कहा करते थे—
खेलोगे-कूदोगे बनोगे ख़राब,
पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब।
हमने खेल आधा छोड़ा,
ख्वाब पूरे पकड़ लिए।
किताबों को सीने से लगाया,
रातों को अपना कर लिया।
सोचा था—
कभी तो दिन बदलेगा,
हम भी किसी ऊँची कुर्सी पर बैठेंगे,
लोग इज़्ज़त से नाम लेंगे।
मगर आज…
इतना पढ़-लिख लेने के बाद भी
कहाँ है वो नवाबी?
न कोई महल,
न कोई तख़्त,
न वो शान
जिसका वादा बचपन में सुना था।
हाँ, समझ आई है बहुत,
ज़िम्मेदारियाँ भी आई हैं,
संघर्ष भी साथी बन गया है।
अब लगता है—
बुज़ुर्गों ने झूठ नहीं कहा था,
बस अर्थ अधूरा बताया था।
नवाब होना शायद अमीर होना नहीं,
बल्कि हालात से हार न मानना है।
खेलना भी ज़रूरी था,
पढ़ना भी ज़रूरी है—
पर सबसे ज़रूरी
इंसान बने रहना है।
आज अगर कोई बच्चा खेलता दिखे,
तो मैं उसे रोकूँगा नहीं।
बस इतना कहूँगा—
खेल भी लो, पढ़ भी लो,
पर अपने सपनों की कीमत
किसी कहावत से मत तय करना।
आर एस लॉस्टम












