
बौद्धिक बल पर हुआ विकास।
फिर भी जिंदगी क्यूं नहीं पास।
बुद्धि तो साधन है,नहीं साधना।
साधना भावमय एक अराधना।
सद् बुद्धि मंजिल तक पहुंचाए।
फिर भी मानव क्यूं अकुलाए।
बिन भाव जीवन नीरसता आए।
भाव गंग सरिता स्नान कराए।
भाव ही जीवन का बने आधार।
ये प्रेम वल्लरी जीवन सदाबहार।
भावमय जीवन सब को दरकार।
बिन इसके जीवन में रोग हजार।
भावजल से आप्लावित नर-नार।
तनाव मुक्त उपजे प्यार ही प्यार।
रक्तचाप,मधुमेह के हटे आधार।
जिए जिंदगी जीवन में दरकार।
भावहीन नर पहुंचे नर्क के द्वार।
संबंधों में नित्य एक नई दरार।
सत्कर्मों से उपजे ये भाव जगत।
भाव बिन हो भक्ति न हरिभक्त।
बिन भाव सुख कल्पना बेकार।
भाव बिन भक्ति न हरि के द्वार।
- महेश शर्मा, करनाल












