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यथार्थ

सत्य की खोज में
जन-जन हुआ किंकर्तव्यविमूढ़
चहुं दिस क्या सत्य क्या असत्य
रहस्य हुआ ये गूढ
छल-प्रपंच से लिपटी शब्दावली
जिह्वा से नाप तोल वे बोलें
नहीं पता जन-जन को …. बातें बस स्वार्थ रस घोलें
सत्य छुपा ले अंतर में… भेद जिया कभी न खोलें ।

कर्णधार होने का जो डंका पीटें
आमजन को बेदर्दी से कांटों में घसीटें
आज युवा हो या प्रोढ
अपने कर्मों से कम
इन दिवास्वप्न दिखाने वालों के मायाजाल से वे निराश
सत्य का भेद न पा सकें
असत्य के जाल में फंस कर कहां उच्छवास ।

पृथ्वी पर हर कौने में
वक्त के झंझावात के वे बने ग्रास
मानवता लुढ़क चली
असत्य की आंधी में बुद्धिजीवी भी फिरे बदहवास
रास्ता कहां मिले जब लुप्त हुआ प्रकाश।

ज्ञानवान की बौद्धिकता का
ऐसा न देखा ह्रास
बुद्धिजीवी से अधिक सुरक्षित
जो काटें घास
क्या बनेगा दुनिया का
भविष्य की चिंता में डूब गए
ढाक के वही तीन पात
चौथा लगे ना पांचवे की आस ।

                                          महेश शर्मा, करनाल

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