
जपती आठो याम हूँ,साम्ब सदा शिव नाम।
मन मंदिर में छवि बसी,लगती है अभिराम।
सुख मिलता भरपूर है,उपजे शुद्ध विचार,
मिले शंभु आशीष जब,पूर्ण सभी हों काम।।
गंगाजल अभिषेक से,होते शिव संतुष्ट।
मन से जो पूजन करे,उसको रखते पुष्ट।
अजब-गजब परिवेश है, बाबा भोलेनाथ,
भक्तों पर करते कृपा,होते कभी न रुष्ट।।
कैलाशी घट-घट बसें , निरखें चारों ओर।
महिमा अपरंपार है, दें उजास की भोर।
लोभ मोह से दूर रह, दिगंबरी परिवेश,
अभयंकर शिव शंभु जी, बंँधे भक्ति की डोर।।
गिना रहे पर दोष को,स्वयं न देखे लोग।
सदियों से क्रम यह बना, करते सब उपयोग।
आत्ममुग्ध होते सदा,कर दूजे का हास,
पर ईश्वर सब देखता, रखता सबका योग।।
डॉ गीता पाण्डेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश













