
कुसंस्कारों की बस्ती में संस्कार ढूंढता हूँ,
अशिष्टों से भी अपेक्षित सत्कार ढूंढता हूँ।
मिट गईं लाखों हस्तियाँ, जो क़ाबिले-तारीफ़ थीं,
अब भीड़ में इंसानियत के किरदार ढूंढता हूँ।
खो गई है ईमान, जो दिखते थे कभी हर एक गली में,
सजे हैं झूठ का बाज़ार, सच की दुकान ढूंढता हूँ।
बिक रहे हैं रिश्ते अब तोल मोल बोल के,
उन रिश्तों में मैं, प्रेम का उपहार ढूंढता हूँ।
ढूंढ रहा हूं खुशबू स्नेह की, घृणित हवाओं में,
ज्येष्ठ की दोपहरी में,सावन का बहार ढूंढता हूँ।
भरे हैं गुबार जहां स्वार्थ, अहंकार के,
वहां त्याग और सेवा का व्यवहार ढूंढता हूँ।
विपरीत हालातों से लड़ने का जज़्बा अभी जिन्दा है,
जला दे हर कुविचारों को, ऐसा एक अंगार ढूंढता हूँ।
गिर गई इंसानियत, बदल गए परिवेश अब,
कलियुग में भी सतयुग का विचार ढूंढता हूँ।
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड













