
मैं रास्ते का पत्थर,
न गिनती में रहा न भरपाई में,
इधर उधर* सरकती जाए श्री सालीगराम सी काया,
न मैं मूल निवासी न मैं ब्याज प्रवासी,
न तो घाटा में उतरूं ,
ना हि अबेरन जाऊं मुनाफा की कमाई में,
न घर की दहल पे चुनों जाऊं,
ना ही मेढ़ी पे चढ़ाया जाऊं,
ना सूत सावल करके रखे मुझे दीवारों की चुनाईं में,
मैं रास्ते का पत्थर,
ठोकरें खाने में ही रहा,,
पगडंडी पर चलते हुए होते रहें हैं मुझ पर सितम
जख्म मिलते ही रहें हैं ठोकरें आजमाई में,
हां कोई लेकर घर चला आया तो फेंका मुझे किसी गड्ढे की भराई में,,या इकट्ठा कर दिया मुझे मेरे बहिन भाई में
बरसों बाद नींव रखी और सरका दिया नींव की खुदाई में,,,
क्या भाग्य संवारा है खुदा तुने मेरा,
कैसे शुक्रिया अदा करूं मैं, खुदा की खुदाई में।।
अशोक सुमन/
भवानी मंडी/राज.













