
घूँघट केवल वस्त्र नहीं, संस्कृति का सम्मान है।
लज्जा, मर्यादा, शील-भाव का अनुपम यह वरदान है।
ममता की मुस्कान छिपाए, आँखों में अरमान लिए।
घर-आँगन को स्वर्ग बनाती, मन में नव अभियान लिए।
रीति-रिवाजों की सुगंध यह, पीढ़ी से पीढ़ी आई।
प्रेम, समर्पण, त्याग सिखाती, जीवन की सच्ची तरुणाई।
घूँघट हो यदि स्वेच्छा से तो, उसकी अपनी शान रहे।
नारी के हर मान-सम्मान का, सदा अमर अभियान रहे।
ज्ञान, कर्म, साहस से नारी, जग में ऊँचा नाम करे।
संस्कारों की ज्योति जलाकर, जीवन को अभिराम करे।
घूँघट की ओट से भी देखे, नवयुग का विस्तृत आकाश।
स्वाभिमान के दीप जलाकर, लिख दे अपना स्वर्ण इतिहास।
नारी शक्ति का मान बढ़े, हर घर में उजियारा हो।
घूँघट हो या मुक्त गगन हो, उसका जीवन प्यारा हो।
संस्कारों की छाँव रहे, मन में नव विश्वास खिले।
घूँघट हो सम्मान का प्रतीक, नारी के सब स्वप्न मिलें।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













