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“मैं तेरा हर रूप बनजाऊं”*

( कान्हा में विलय)

मैं बन जाऊं माला, तुम मुझे कंठ में सजा लेना ।  

मैं सजू तेरे लिए, तुम मुझे सजा लेना।

मैं बन जाऊं धूल, तुम अपने चरणों में लगा लेना।

मैं बनाऊं चित्र तुम्हारा, तुम मेरा चरित्र बनाना।

मैं बन जाऊं काजल, तुम नेत्रों में लगा लेना।

मैं बन जाऊं घुंघरू , पैरों में मुझे जगह देना।

मैं बन जाऊं तुलसी, माथे में लगा कर चमका लेना।

मैं बन जाऊं महावर, चरणों में थोड़ी सी जगह देना।

मैं बन जाऊं मोर पंख, शीश मुकुट बना लेना।

मैं बन जाऊं वसन तो ,देह में मुझको धारण करना।

मैं बन जाऊं मोती, माला बनाकर हृदय से लगाना।

मैं बन जाऊं बांसुरी, अपने अधरों से लगा लेना।

मैं बन जाऊं पवन, छूना मुझको पवित्र करना।

मैं बन जाऊं नीर तो , गंगा सा पावन बना देना।

मैं बन जाऊं कोई शब्द, जिव्हा में मुझको रख लेना।

मैं बन जाऊं कोई पुष्प तो, तेरी सेवा में लगा लेना।

मैं बन जाऊं धूप- बाती , थाली में मुझको सजा लेना।

मैं बन जाऊं अक्षत, तिलक मुझको बना लेना।

मैं बन जाऊं मानव, भक्त मुझे बना लेना।

मैं बन जाऊं प्रेम तो कान्हा हृदय से मुझको लगा लेना।

मैं बन जाऊं दासी, सेवक मुझे बना लेना।

मैं बन जाऊं स्वांस तो, स्वयं में मुझको विलीन कर लेना।

(कान्हा जी की दिवानी )
अनिता महेश पाणिग्राही
सरायपाली छत्तीसगढ़

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