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वक्त का पहिया

वक्त पहिया पलट गया
मंगल उदित
अब वो राशि बदल चला।
थी कभी
चिंघाड़ में ताकत
वक्त है बेवफ़ा,
बेवफाई वो कर चला।
जो सोचे था
धुरंधर तो ये वक्त है
जो बिगड़ चला।
ताक़त के नशे में जो चूर
वो नशा
अब उतर चला।
दुनिया की नहीं की परवाह
सपने थे जो पाले
वक्त वलवला तूफान सम
पूरी धरा को
निगल चला ।
ऊपर बैठा जग नियंता
सब देखे
वक्त ही वलवला बन चला
वक्त की ठोकर पर जमाना
गर्दिश करें वो सितारे
उस ( नियंता ) की रजा से
वक्त चला ।
वक्त नहीं किसी की बपौती
वो होगा
जो उस को पढ चला ।

       महेश शर्मा, करनाल

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