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खेवनहार

इंसान अपनी जिंदगी भूल कर
सक्षम लोगों के
मोह में फंसे
दौड़ कर ।

अपनी जिंदगी के
सुखों की बली देने लगे
परमात्मा भी
उस मोह में फंसे इंसान को
चला जाता है छोड़ कर ।

हे इंसान — जरा सोच
वो कौन है
जो है– तेरी नैया का खेवनहार
भवसागर की
उच्छल तरंगो से
पल-पल जो भिड़ गया
न भागा तेरी कश्ती को छोड़कर ।

सत्य प्रेम करे जो
बात उसकी न सुने
सो जाए मुख मोड कर
रोए हैं वो सब
सब खो कर
सुविधा भोगी हैं सब
पैसे की भूख बहुत बुरी
ये प्रेम नहीं
प्रेम में खा जाएं
निचोड़ कर ।

महेश शर्मा, करनाल

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