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खनकते सिक्कों के बाज़ार में

खनकते सिक्कों के बाज़ार में अपना स्थान न बनाया जाए।
भोर हुई और नया सूरज चमक उठा ऐसा शोर मचाया जाए।।

खनकते सिक्कों की धुन हर दिल में उतर जाती है।
खरीदने तथा बेचने वालों में खूब उम्मीद जगाती है।।
कलयुग में इंसानियत तो जैसे छिप ही जाती है।
बस धन-दौलत की चकाचौंध ही नज़र आती है।।

खनकते सिक्कों के बाज़ार में अधिक समय मत बिताया करो।
तन-मन की सच्ची सेवा करने में कीमती समय लगाया करो।।
बुझे हुए दिल में स्नेह और सहानुभूति के दीप जलाया करो।
इस प्रकार संसार में रह कर मानवीय मूल्यों को निभाया करो।।

छोटे-बड़े, ऊँचे-नीचे व अपने-पराए के भेद मिटाने हैं।
एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ से खुद को बचाने हैं।।
सुंदर सृष्टि में नेक दृष्टि रखते हुए खूब नाम कमाने हैं।
स्नेह से भरे पैगाम ही प्रत्येक घर में मिलकर पहुँचाने हैं।।

खनकते सिक्कों के बाज़ार में इंसानियत खोनी नहीं चाहिए।
सभी का सहयोग करने वाली कला विद्यमान होनी चाहिए।।
स्वामी विवेकानंद जी के समान दुनिया दयावान होनी चाहिए।
शांति, सुख, खुशियों आदि से सबकी झोली भरी रहनी चाहिए।।

अंत में खनकते सिक्कों के बाज़ार से स्वयं को हटाएँ।
परोपकारी भावनाओं के साथ सभी का हाथ बँटाएँ।।

कवयित्री-डॉ. ऋचा शर्मा “श्रेष्ठा” करनाल (हरियाणा)

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