
प्रेम भावनाओं का केंद्र बिंदु,
ईश्वर नहीं तो फिर कौन है..?
बेशक ,प्रेम भावनाओं का केंद्र बिंदु है
ईश्वर नहीं तो फिर कौन है?
मंदिर हो ,मस्जिद हो, चाहे गुरुद्वारा हो
ईश्वर को जाकर क्यों ढूंढना.?
वह तो हम सबके दिल के धड़कन में बसे हुए हैं
प्रेम ही पूजा है, नाम ही अर्चना है
प्रेम के बिना सब कुछ अधूरा है
ईश्वर में प्रेम निहित है
ईश्वर ने इतनी सुंदर सृष्टि की रचना की है
ईश्वर के प्रेम को साधक तभी प्राप्त कर सकता है
जब वह पूर्ण रूप से स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर देता है
यह प्रेम निष्काम भक्ति, निस्वार्थ सेवा और सच्चा ज्ञान प्राप्त करने पर ही होता है
गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है
मां से ‘मैं’ और ‘मेरा’का भाव मिटाना होगा
मीरा ने बहुत ताने सुने फिर भी प्रेम को ही चुना
तभी तो जहर भी अमृत बना
प्रेम भावनाओं का केंद्र बिंदु है
ईश्वर नहीं तो फिर कौन है दोस्तों!
डॉ मीना कुमारी परिहार










