
प्रेम के रूप भी बदलने लगे हैं,
जैसे इश्क शाम से ढलने लगे हैं।
कल तक जो धड़कनों में बसते थे,
आज वो खामोशियों में पलने लगे हैं।
वो नजरें जो हर बात कह जाती थीं,
अब सवालों में ही उलझने लगे हैं।
हाथों की गर्मी जो सुकून देती थी,
अब फासलों से ही जलने लगे हैं।
वक़्त ने शायद कुछ यूँ करवट ली है,
कि अपने भी अजनबी से लगने लगे हैं।
प्रेम के रूप भी बदलने लगे हैं,
जैसे इश्क शाम से ढलने लगे हैं
आर एस लॉस्टम










