
अब सहा नहीं जाता वक़्त के ये सितम,
दिल भी थकने लगा है ये हर रोज़ का ग़म।
हर लम्हा जैसे बोझ बनकर गिरता है,
साँस लेना भी अब लगता है एक करम।
ख़्वाब जो बुने थे कभी रौशनी के लिए,
आज वही दे रहे हैं अँधेरों का भरम।
किससे कहें दर्द अपना, कौन समझेगा यहाँ,
हर चेहरा लगने लगा है जैसे कोई संगम।
चलते-चलते कहीं खुद से ही बिछड़ न जाएँ,
ये सफ़र भी अब लगता है अधूरा सनम।
रिश्ते का गठ-जोड़ भी अब ढीला सा पड़ गया,
वक़्त की मार से हर वादा बिखर गया।
बातों में जो कभी मिठास घुला करती थी,
आज वही लहजा जाने क्यों कड़वा हो गया।
साथ चलने की क़सम थी उम्र भर की मगर,
राह में ही कहीं कोई मोड़ आ गया।
तुम भी खामोश रहे, हम भी कुछ कह न सके,
दरमियाँ यूँ ही एक फ़ासला सा बन गया।
फिर भी दिल के किसी कोने में उम्मीद है,
शायद ये टूटा हुआ रिश्ता फिर जुड़ जाए।
वक़्त बेरहम—न ज़िंदा हैं, न जीने देता,
हर घड़ी दर्द को सीने में ही पीने देता।
साँस चलती है मगर रूह थकी लगती है,
ज़िंदगी बस कोई बोझा सा ढोने देता।
ख़्वाब आँखों में थे, सब धूल में मिलते देखे,
आईना अब भी मगर झूठा सा सीने देता।
तुम गए, फिर भी तुम्हारी ही कमी बाकी है,
ये अकेलापन कहाँ खुद को यक़ीं देता।
कब तलक यूँ ही अँधेरों में भटकना होगा,
कोई तो राह हो जो थोड़ा सा जीने देता।
मैं बैठी सोचती हूँ—ऐसी क्या ख़ता थी,
जो तू इतना निर्दयी, इतना बेवफ़ा था।
कभी तेरी नज़रों में था अपना ही जहाँ,
आज वही नज़र क्यों मुझसे ख़फ़ा था।
हमने तो चाहा तुझे हर दुआ में शामिल,
फिर ये इश्क़ क्यों सज़ा बनकर मिला था।
तूने तोड़ दिए वो सारे वादे चुपके से,
जिन पे कभी मेरा पूरा भरोसा टिका था।
अब भी दिल पूछता है तन्हाइयों में अक्सर,
क्या मेरी मोहब्बत में ही कोई कसूर छुपा था।
आर एस लॉस्टम










