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गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर

रविन्द्र स्वर मधुमय गूँजे, हर उर में मृदु-प्यार,
शब्द-सुमन में राग बसा है, झरता सुधि अमृत-धार।
कोलकाता की पुण्य धरा पर, जन्मा ज्ञान-सूर्य,
जग में फैली ज्योति अनोखी, हरता तम का धुंध।

शांतिनिकेतन छाँव तले जब, शिक्षा का विस्तार,
प्रकृति संग अनुराग रचाया, खुला ज्ञान-द्वार।
मुक्त गगन में स्वप्न सजाए, मानवता का गीत,
प्रेम-दीप हर मन में जले, मिटे सकल संकीर्ण प्रीत।

गीतांजलि की दिव्य पंक्तियाँ, छू लें अंतर-प्राण,
करुणा, सत्य, प्रेम सिखाएँ, करें हृदय कल्याण।
सरल भाव में गूढ़ दर्शन, जीवन का आधार,
हर जन के मन में जगता है, नव चेतन संचार।

नोबेल का वह दिव्य क्षण, गौरव भारत-भाल,
प्रथम एशियाई बन जग में, बढ़ाया देश का मान।
साहित्य-साधक जग में बनकर, पाया उच्च स्थान,
रविन्द्र नाम अमर हो गया, गूँजे सकल जहान।

जन-गण-मन की मधुर तान में, राष्ट्रप्रेम साकार,
एक सूत्र में बाँध दिया है, भारत का परिवार।
अमर रहेगा काव्य तुम्हारा, युग-युग तक मुस्काए,
गुरुदेव के पावन चरणों में, कोटि नमन झुक जाए।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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