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कैसे बताऊं कौन हो तुम


विधा-काव्य

कैसे बताऊं कौन हो तुम
दर्द कहूँ या जीने की उम्मीद
बेवफा कहूँ या वक़्त का सितम
हकीकत हो या सिर्फ फ़साना
समझ आज तलक ना आया मेरे कौन हो तुम

सिला प्यार का था या एक था एक भरम
नीन्द मे थे या खुली आंखों मे थे तुम एक सपन
पढ़ ही ना पाया मैं मूरख तेरा अन्तर्मन
बिन कशिश ही तुम्हे पाने का करने लगा जतन
हवा का एक झौंका था इश्क का एक सैलाब
ना जान पाया की कौन हो तुम

दो जख बीत गये इन्तीज़ार मे तेरे
तन्हाईयों से ही मेरा राफ्ता है
रब जाने क्या तेरा मेरा वास्ता है
तड़फ पर आज भी तेरा ही नाम लिखा है
बन्द आंखों मे तेरा ही अक्स छुपा है
मिलन की एक कसक क्यों आज भी वाकी है
तू नही तो क्यों तेरी याद सताती है
कुछ तो बता दे ए मेरे दिल
ये रिश्ता क्या है जिसके लिये आज भी एक अबूझ प्यास है
ये तेरा सितम है या मेरा वहम
जान ना पाया कि कौन हो तुम
कैसे कह दूँ मेरे कौन हो तुम।


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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